पाकिस्तान के प्रॉक्सी वार को पूँछ से पकड़कर रगड़ दिया गया है । लोककल्याड मार्ग पर चलते हुए भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक्स में 40 से 200 के बीच जिहादियों को उनके छह दर्जन हूरों की सोहबत में पहुँचा दिया है । कश्मीर से लेकर पंजाब के आसमान में तनाव के बादल छाए हुए हैं, देश क्रुद्ध है और कुछ खास जन गलत कारणों से चिन्तित ।

चाय-सिगरेट के गल्लों से ले के व्हाट्सऐप ग्रुप्स तक देश एक हुआ पड़ा है । नवरात्रों में जो जाम कम छलक पा रहे हैं, उसकी कमी आम आदमी राष्टप्रेम छलकाकर कर ले रहा है । आम घरों में ‘अजी सुनती हो’ से ज्यादा ‘क्या युद्ध होगा’ सुनने को मिल रहा है । बच्चे और किशोर भी हनी सिंह के गानों के ज्यादा “माँ मुझको बन्दुक दिला दे” का श्रवण – पाठन कर रहे हैं । ऐसे में सिर्फ तीन ही लॉबीज ऐसी हैं जो गलत कारणों से चिन्तित हैं और मुखर रूप से अलग राग अलाप रही हैं । बॉलीवुड , सो कॉल्ड जर्नलिस्ट्स और दिल्ली से युगपुरुष जी ।

बॉलीवुड और सो कॉल्ड जर्नलिस्ट्स के तो कला और मानवता के रेटोरिक में छिपे शुद्ध व्यवसायिक कारण हैं पर युगपुरुष जी भारतीय सेना की ऐसी तैसी सिर्फ और सिर्फ उस मिट्टी के टुकड़े की परस्ती में ही कर रहे हैं जिसे वह अपना वतन मानते हैं । एक ऐसा व्यक्ति जो हर दूसरे दिन किसी न किसी वजह से स्याही या थप्पड़ आदि खाते रहता है और ऐसी घटनाओं का प्रायोजक भी स्वयं होता है , उसके लिए मौजूदा हालात में ऐसा करना इतना आसान तो नहीं होगा ।

2010-11 से अब तक युगपुरुष अपने जीवन में बहुत आगे आ चुके हैं । उन्होंने ‘ब्रेन डेड ज़ोम्बीज़’ की एक ऐसी फसल कल्टिवेट कर रखी है जिसका एक टुकड़ा उनसे उनके इस स्टेप से छीन सकता है । फिर पंजाब और गोआ में चुनाव भी हैं । ऐसे में एक आम नेता अपनी भला सोच, जिस देश का वो ओवर्ट रूप से नागरिक है उसके पब्लिक परसेप्शन के अनुकूल चलता पर सर जी का आचरण विपरीत है। अपने ‘मुल्क’ के प्रति आसक्ति में नफा नुकसान भूल युगपुरुष जी ने सरकार तो सरकार दुश्मन सेना की भी धज्जियां उड़ाई हैं । भाई, वतन परस्त हो तो ऐसा । हम इसकी तारीफ नही भी कर सकते तो भी राष्ट्रभक्ति का तकाजा है कि अप्रेशियेट ज़रूर करें ।

युगपुरुष जी के ‘मुल्क’ के मीडिया ने इन्हें हीरो बनाकर अभी के लिए लॉलीपॉप भी पकड़ाया है पर मेरा मानना है कि आने वाले समय में यदि पाकिस्तान बचता है (जिसकी संभावना वह छोड़ना नहीं चाहता) और इन्हें ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ से नही ‘नवाज’ता तो फिर वे सच में गरीब लोग हैं । बहुत गरीब ।

लेखक -पंचदेव पाण्डेय (@ruppanbabu)

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