न हो कबाब तो आधा दो
हो पास अगर तो ज़्यादा दो
बस दे दो हमको दो सौ ग्राम
रक्खो अपनी प्लेटें तमाम
हम वही ख़ुशी से खायेंगे
आगे न माँग उठाएँगे

पर टुंडा वह भी दे न सका
बदले में मुद्रा ले न सका
उलटे भैंसे काटने चला
औ जनता को बाँटने चला
जब भी कबाब चुक जाता है
तब भोजन तक रुक जाता है

तब मीडिया ने हुंकार किया
फट से अपना विस्तार किया
कैमरे उठे माइक बोले
सड़कों पर पत्रकार डोले
ये सी एम अत्याचारी है
देखो कितनी लाचारी है

इस टुंडे का परिवार देख
मचता है हाहाकार देख
पत्नी भूखी, बच्चे भूखे
कैसे लगते सूखे सूखे
ये न करते तो क्या करते?
क्या सारे ही भूखे मरते?

इनकी रातें कितनी काली
चेहरे पे ज़रा नहीं लाली
ये सबको भैंस खिलाते हैं
एवज़ में मुद्रा पाते हैं
व्यापार है ये, न चोरी है
ये ही जीवन की डोरी है

बरखा बोली, निधि भी बोली
चलती थी शब्दों कि गोली
अख़बार कहें मनमानी है
छापें असत्य, आसानी है
जो भी चाहें बिक जाता है
जो लिबरलगण को भाता है

बोले; माना सब इल्लीग़ल
थोड़ा ही दूध है बाक़ी जल
पर देन ये गंगू-जुम्मन की
बरसों से है उनके मन की
आगे भी यही चलाएँगे
हम इनके ही ग़ुण गाएँगे

योगी जी ने हुंकार किया
औ तर्कों को विस्तार दिया
फिर अपनी बातों को तोले,
एक साँस भरी आगे बोले;
ये आज्ञा अब सरकारी है
चाहे लगती ये भारी है

अब चौकन्ना शासन होगा
बस विधि का ही आसन होगा
लुच्चे भयभीत यहाँ होंगे
नेता तक डरे वहाँ होंगे
सब इल्लीग़ल बूचड़खाने
अब नहीं चलेंगे मनमाने

रोमियो जो पाए जायेंगे
केवल लतियाए जायेंगे
नौकर जो भी सरकारी हैं
हम उनके तो आभारी हैं
पर गुटखा नहीं सहन होगा
ये क़ीमत नहीं वहन होगा

देखें लिबरल क्या करते हैं?
कैसे रपटों को भरते हैं,
असहिष्णुता फिर आयेगी?
क्या चाल चली अब जायेगी?
किसको खोलेंगे तार-तार
या वापस होंगे पुरस्कार?

लेखक : श्री शिव मिश्र (mishrashiv)

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