दावात्याग: व्यसन वही है, कल्पना वही है. यथार्थ से वास्ता अब भी नहीं है.

(वो भारत खंड -२ से आगे)

अगली बैठक जिसमें घनानंद, संग्राम सिंह को उस भारत में धर्म की अवस्था बताने वाले थे, कुछ व्यस्तताओं के कारण लंबित हो गयी थी. घनानंद जी राज्याभिषेक की तैयारी में व्यस्त थे जो शीघ्र ही संपन्न होने वाला था. साथ ही संग्राम सिंह को बृहस्पति ग्रह पर सप्ताहांत में भी कुछ विघ्नता आयी थी. अरब से आये उस धर्म जो अब लुप्तप्राय सा ही था, के कतिपय दुष्टों ने महल पर आक्रमण करने की योजना बनाई थी जिसे बहृस्पति ग्रह के संचालक लक्ष्मण राय के गुप्तचरों ने विफल कर दिया था. लक्ष्मण राय महान राजा मैदिनी राय के वंशज थे और संग्राम सिंह के विश्वासपात्र थे. जब बृहस्पति पर भारत का एकाधिकार हुआ तब महाराजाधिराज प्रबल प्रताप सिंह जी ने पुत्र संग्राम सिंह को संचालन के लिए लक्ष्मण राय की तुरंत नियुक्ति करने का आदेश दिया था. प्रबल प्रताप सिंह जी के भीषण ब्रह्माण्ड युद्ध के बाद बृहस्पति पर पूर्ण विजय पा लेने के गीत प्रजा अब भी बहुत गर्व से गाती थी. यद्यपि लक्ष्मण राय, घनानंद एवम संग्राम सिंह इसके विरोध में थे तथापि प्रबल प्रताप सिंह जी ने अरब से आये धर्म के मुठ्ठी भर देशागतों को दयापूर्वक बृहस्पति में बस जाने की अनुमति दे दी थी. समय समय पर ये झुण्ड बना कर उपद्रव करने का प्रयास करते रहते थे.

संग्राम सिंह माता-पिता के साथ पृथ्वी ग्रह पर लौट आये थे. यहीं से पृथ्वी समेत सभी तीन ग्रहों का संचालन होता था. दूसरे पहर भोजन के पश्चात संग्राम सिंह के मन में विचार आया कि घनानंद जी से आगे की कथा सुनी जाए. संग्राम सिंह ने विचारो के प्रवाह को पाऊस किया. अन्य सभी विचार जो मष्तिष्क में उस क्षण थे, उनसे क्रॉप कर यह विचार घनानन्द जी को फॉरवर्ड कर दिया. घनानंद जी ने त्वरित उत्तर भेजा जो उस समय टीवी देख रहे संग्राम सिंह ने स्क्रीन पर rss फीड की तरह भागता हुआ देख लिया. कुछ समय बाद घनानंद व संग्राम सिंह महल के कक्ष में आमने सामने बैठे थे. प्रशासनिक वायुमार्ग १ से आने में घनानंद जी को मात्र ३० मिनट लगे थे ।

“हाँ तो आज धर्म के विषय पर चर्चा होना तय हुआ था” कहते हुए घनानंद जी ने वार्तालाप आरम्भ किया. उन्होने आगे कहा; “युवराज, धर्म की अवस्था उस भारत में अत्यंत ही चिंताजनक थी. शायद धर्म का इतना पतन कभी किसी और दौर में नहीं हुआ था. इसके कई कारण थे:

१-धर्म का विकेन्द्रीकरण
२-वामपंथ तथा उदारवाद
३-वोट की राजनीति

धर्म के विकेन्द्रीकरण से मेरा तात्पर्य है कि हिन्दू धर्मावलंबियों में अन्य धर्मों की भांति सर्वोच्चता का भाव न होना. अन्य धर्मों की भाँति हमारा वेटिकन या मक्का नहीं था. हर गली में बैठे धर्म के कुछ ठेकेदार थे जो झोला खोल कर हमारे पर्वों की तिथियों /समय की घोषणा करने का अधिकार रखते थे. ईश्वर की इच्छा के नाम पर कुछ भी बोल कर धन कमाने में लिप्त रहते थे. धर्म की कोई जानकारी न होते हुए ऐसे ठग ही धर्म की व्याख्या करने लगे थे. कुछ अति पेशेवर व इवेंट मैनेज्ड बाबा थे जिन्होंने धर्म सिखाने के नाम पर असीम धन अर्जित कर लिया था. प्रजा भी कभी ज्ञान के अभाव में और कभी अंधविश्वास में इन बाबाओं के जाल में फंसती रहती थी.

रुस व चीन के मानसपुत्र वामपंथी धर्म व ईश्वर कुछ नहीं है, यह वर्षों तक प्रजा के एक वर्ग को समझाते रहे. उन्होने भारत की कई पीढ़ियों को अधर्मी बना दिया. उदारवादियों या लिबरल्स जिनमे एक बड़ा हिस्सा छद्म बुद्धिजीवियों का था, अपने उदार लहज़े व मीठी वाणी में सिंगल माल्ट के घूँट लगा व सिगार के कश लेते हुए बताते थे कि धर्म इत्यादि बहुत पिछड़ी हुई मानसिकता है और वे आधुनिक हैं. युवराज, एक अंग्रेजी शब्द ‘कूल’ आधुनिकता का पर्याय बन प्रचलित था उस समय. उनको आधुनिक समझ लोग धर्म भूल कर उस जीवन शैली का या तो अनुसरण करने लगे या करने का सामर्थ्य ना होने पर उस जीवन शैली को अपनाने के सपने देखने लगे. धर्म को भुला दिया गया और लोग वह सब करने लगे जो कूल दिखने के लिए जरुरी था.”

संग्राम सिंह के मुख पर पीड़ा के भाव देख घनानंद ने कहा; “युवराज उस भारत की वो पीढी मूर्ख नहीं थी. बस उस समय के धूर्त राजनीतिज्ञों ने प्रणालीगत तरीके से उनका वशीकरण कर दिया था. अपनी सत्ता के लालच में वो अल्पसंख्यक विशेषकर अरब से आये धर्म को सुरक्षा देने के नाम पर खूब तुष्टिकरण किया. अपने धर्म से मानों उन्हें शत्रुता थी. प्रजा भी मुख्यतः अपने धर्म वाली जब इस पारस्परिक भाईचारे की अफीम के नशे से सुध में आने लगती तो ये धूर्त उन्हें असहिष्णु करार देते या आपस में लड़ा देते. अंततः जीत उन्ही की होती और गद्दी पर पुनः वही बैठता जो अधर्म फैलाने का कार्य करता.”

आँख बंद कर संग्राम सिंह ने कहा; “आचार्य यह तो भयावह थी. आज के अपने भारत को देख विश्वास ही नहीं होता कि उस अवस्था से धर्म को इस गौरवशाली स्थान पर लाना संभव भी था. क्या हम
उन्ही गलतियों की पुनरावृति तो नहीं कर रहे आचार्य ?” घनानंद ने प्रसन्नता भरी मुस्कान मन में ही दबा कर अपने मुख को भाव विहीन रखकर यह दर्शाया मानों वो समझे ना हों (ऐसा करने में वो पारंगत थे). परंतु घनानंद को संग्राम सिंह का संकेत स्पष्तः समझ आ गया था. वह महाराजा प्रबल प्रताप जी द्वारा बृहस्पति पर म्लेच्छों को बसाने के घनानंद के ताने को समझ गये थे. घनानंद का हृदय हर्ष से भर आया. वह भारत के भविष्य को सशक्त व सुरक्षित हाथों में साफ़ साफ़ देख रहे थे.

विमला रानी के मारीच रुपी रोबोट ने आ कर रात्रि भोजन का आग्रह किया तो संग्राम सिंह ने घनानंद से कहा; “आचार्य आप प्रायः भोजन न करने का कोई न कोई कारण बता कर चले जाते हैं आज हमें एक ब्राह्मण को भोजन कराने के पुण्य से वंचित ना करें.” घनानंद ने मुस्कुराकर सहमति दे दी. कुछ ही पलों में संग्राम सिंह के लिए राज पाकगृह से व घनानंद के लिए शाकाहारी पाकगृह से भोजन मँगाकर विमल रानी के मारीच रूप ने सजा दिया.

घनानंद बोले; “युवराज अब भोजन के साथ -साथ आपको धर्म के उत्थान की कथा सुनाऊंगा. धर्म के उत्थान का प्रयास उस भारत में ही आरम्भ हो चुका था. एक ऐसे दृढ़ व्यक्ति की तलाश थी जो अधर्मियों की सेना से, जिस सेना में धूर्त राजनीतिज्ञ, उनके पैसो पर पलने वाले पत्रकार तथा दूसरे देशों के पैसो पर पलने वाले उदारवादी आते थे, से निर्ममता पूर्वक लड़ सके. इक्कीसवीं शताब्दी के लगभग प्रारम्भ में ऐसा एक व्यक्ति आया जिसने उस भारत में लोगों की सोच में बहुत कुछ बदल कर शुरुआत की. विधर्मियों के बारे में जिन बातों को घरों में प्रजा चुपचाप एक दूसरे से करती थी, वह मुख्य धरा के टीवी चैनलों पर खुले आम विवाद का मुद्दा बनने लगे. कुछ नेताओं को पूर्व राजनीतिज्ञों ने लगभग ईश्वर का दर्ज़ा दे रखा था. उनकी सच्चाई खुल कर बोली जाने लगी. पहले इन विषयों पर पूर्ण टैबू था. कुछ देवालय जो मलेच्छ आक्रांताओं ने गिरा कर अपनी इमारतें खड़ी कर दी थीं, उनको उनके पूर्व स्वरूप में लाने की कोशिशें होने लगीं. लोकतंत्र की सीमाओं में बंधे रह कर इस नेता ने धर्म के उत्थान के लिए बन रही सड़क पर कुदाल का प्रथम प्रहार कर दिया था ।”

भोजन समाप्ति के उपरांत धनानन्द ने इसके बाद संग्राम सिंह से विदा ली, इस वादे के साथ कि अगले निमंत्रण पर वह उस भारत के धर्म उत्थान की पूरी कथा सुनाएंगे.

क्रमशः

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