वो भारत खंड -२

(वो भारत खंड -१ से आगे)

दावात्याग – इस खंड का भी यथार्थ से किसी भी प्रकार का कोई वास्ता नहीं है । यह भीे उसी व्यसन-विशेष के उपरांत की गयी लेखक की कल्पना की उड़ान मात्र है ।
जिन भले मानुषों को समझ थी वे अपना धर्म और जाति देखकर वोट देते थे । उम्मीदवार चाहे कितना बड़ा डकैत क्यों न हो जैसे जीतने के बाद सबसे पहले वह उनके घर आ कर पूछेगा – भाई अब बताओ क्या क्या काम थे तुम्हारे ? समझदार चुनने वाला या तो वोट देने ही नहीं जाता था और यदि किसी वर्ष लोकतंत्र पर एहसान करने का मूड हो आया तो सबसे पहले चुने जाने वाले की जाति, धर्म व उसकी पार्टी देखता था । उसकी योग्यता से समझदार को कोई लेना देना नहीं होता था । नासमझ, आस पास वालों ने जो कहा या जिसने मदिरा/ मुद्रा दे दी उसके नाम व चिन्ह पर बटन दबा आता या मुहर लगा आता था । कुछ तो चुने जाने वाले या वाली के रंग रूप पर मिट कर ही बटन दबा आते थे । योग्यता जब कोई पैमाना ही न थी तो शासक कितने योग्य चुने जाते रहे होंगे, युवराज ये आप स्वयं समझ लें । ऐसे शासक देश और प्रजा का क्या हाल करते होंगे, यह अनुमान लगाना भी कठिन नहीं है । कुल मिलाकर भ्रष्टाचार, गुंडागर्दी व अराजकता चरम पर थी । गलती से कोई योग्य शासक आ भी जाये तो बाकी मक्कार मिल कर उसे कुछ करने नहीं देते थे । अब तो अपने राजतंत्र में राजा का कहा अंतिम निर्णय होता है । वह जो करना चाहता है, देश के लिए करता है पर उस समय देश का प्रधान कुछ करे तो विरोधी पार्टियों के मक्कार मिल जाते और संसद न चलने देते । उनके स्वर में स्वर मिलाने को बिके हुए पत्रकारों की फौज भी जुड़ जाती और जब ये सब भी कम पड़ता तो न्यायालय में ऐसा फंसा देते कि सालों साल मामला ही अटक जाये । मतलब यह कि काम के अलावा और सब कुछ होता था ।

संग्राम सिंह ने घनानंद की ओर देखा । उनके मुख पर कुछ इस तरह का भाव था मानों वे घनानंद की बात से सहमत तो हैं पर फिर भी औपचारिकतावश शंका निवारण करने के लिए पूछ रहे हों – परंतु आचार्य, इस बात की संभावना भी तो है कि राजा भी अकर्मण्य या दुष्ट निकल जाये । घनानंद महाशया ने प्रश्न के भाव को भाँपते हुए उत्तर देना आरम्भ किया – युवराज, इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता परंतु अभी तक अपनाए गए सभी प्रकार के तंत्रों में कोई अपने में सम्पूर्ण नहीं हैं । सब में कोई न कोई कमी है । बाहर से आये मलेच्छ शासकों/ लुटेरों को छोड़, आप कितने राजाओं के नाम जानते हैं जो अकर्मण्य थे, दुष्ट थे या देशद्रोही थे ? जबकि उस भारत के भ्रष्ट, देशद्रोही व अकर्मण्य नेताओं के नाम गिनाने से सरल यह है कि उन २-४ नेताओं के नाम गिन लिए जाएं जो उपरोक्त दुराचारों से ग्रसित नहीं थे । हमारे हिन्दू राष्ट्र के कुछ राजा भले ही विलासी रहे हों, सोमरस पान करते हों जो क्षत्रियों पर वैसे जंचता ही है पर उन्होंने देश या प्रजा से गद्दारी कभी नहीं की । जबकि उस भारत में शासकों ने कुर्सी के लिए किसी भी सीमा तक गिरने का कार्य निरंतर किया ।

घनानंद के सोमरस वाले कथन पर संग्राम सिंह मुस्कुराये बिना न रह सके । हल्की सी मुस्कान उनकी घनी मूंछों को भी भेदती हुई घनानंद को दिखी और संग्राम सिंह ने Chardhu-122 years सिंगल माल्ट को गिलास में उड़ेल लिया । संग्राम सिंह ने जन्म से ही शस्त्रों की शिक्षा पायी थी । पुराने युग की तलवार जब अनुष्ठान आदि पर चलाते तो प्रजा देखती ही रह जाती थी । अब के आधुनिक शस्त्रों में भी उन्हे बहुत निपुणता प्राप्त थी । ऐसा माना जाता था कि समस्त ब्रह्माण्ड में उनके जैसा स्नाइपर कोई नहीं है । आयुध कारखाना तिरुचिरापल्ली में निर्मित ‘विध्वंसक-X236A3’ राइफल तथा ‘एसक्यूरेसी इंटरगैलक्टिकल-L600X5’ उनके प्रिय हथियार थ । टेलीस्कोपिक दृष्टि युक्त ‘विध्वंसक-X236A3’ पूर्णतः स्वदेशी था । इसकी रेंज 14.5×114mm के कारतूस से 60 km तक होती थी । ‘एसक्यूरेसी इंटरगैलक्टिकल-L600X5’ कभी 150 वर्ष पूर्व तक इंग्लैंड में ‘एसक्यूरेसी इंटरनेशनल’ के नाम से बनायी जाती थी जिसे बाद में भारत के तत्कालीन राजा अरिदमन सिंह ने खरीद लिया था और इसका निर्माण भी तिरुचिरापल्ली में होने लगा था । संग्राम सिंह के पूर्वज अरिदमन सिंह के समय में कई विदेशी कंपनियों का अधिग्रहण हुआ था । अमेरिका की GMC उनमें से एक थी । अब भारत की अशोक लिलेंड ने अपने आल टेरेन ट्रक, ऐरावत-AWL(जल, थल व वायु) के साथ GMC के पिकअप चेतक और क्रॉसओवर गरुड़ भी बनाना शुरु कर दिया ।

द्वारपाल ने अंदर आने की आज्ञा मांगी तो संग्राम सिंह ने सर हिला कर अनुमति दी । महल के उस भाग में सुरक्षा कारणों से जैमर्स लगे थे । अतः किसी भी प्रकार का इलेक्ट्रॉनिक व टेलीपैथिक संवाद वर्जित था । द्वारपाल राजनर्तकी अम्बापालिका का सन्देश ले कर आया था । राजनर्तकी ने पूछा था कि क्या युवराज के लिए आज संध्या नृत्य संगीत की तैयारी करवानी है ? संग्राम सिंह ने द्वारपाल से कहा कि वह सम्मानपूर्वक अम्बापालिका जी को सन्देश दे कि आज वे कुछ तैयारी न करें । सप्ताहांत माता पिता के साथ ब्रहस्पति गृह पर बने अपने महल में बिताने की योजना थी और संग्राम सिंह को यात्रा की तैयारी करनी थी । द्वारपाल जाने को मुड़ा ही था कि राजमाता विमला रानी को आते देख सर झुकाकर खड़ा हो गया । घनानंद ने हँसते हुए बताया ये राजमाता नहीं हैं, वो महल के इस भाग में आ ही नहीं सकतीं । यह रोबोट मारीच है जो उनका कोई सन्देश लाया है और इस कारण उन्हीं के रूप में है । विमला रानी नें दोनों भद्र पुरुषों को रात्रि भोजन का निमंत्रण भेजा था । संग्राम सिंह ने ३० मिनट में उपस्थित होने का सन्देश वापस राजमाता को भिजवा दिया ।

घनानंद की ओर देखते हुए संग्राम सिंह ने कहा- आचार्य हमें बहुत जिज्ञासा है कि उस भारत में धर्म किस अवस्था में था । अवसाद का भाव मुख पर लिए घनानंद ने कहा- वो बहुत दुखद वृतांत है, अगली बैठक में युवराज को धर्म की उस अवस्था और फिर उसके उत्थान की गौरव गाथा सुनाऊँगा। अभी आज्ञा दें, मैं भोजन अपने घर ही करूँगा क्योंकि कुछ अतिथि आए हुए हैं । युवराज, आप भी भोजन हेतु प्रस्थान करें । संग्राम सिंह ने भी प्रणाम कर आचार्य से विदा ली ।

क्रमश:
लेखक – @Nitishva_

5 COMMENTS

  1. अति उत्तम महाशय.. वर्तमान दृश्य एवं घटनाक्रम को बहुत ही अच्छे शब्दों व कल्पनाशक्ति के साथ उकेरा है..

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