भाजपा के एक विधायक की ताजमहल पर की गयी टिप्पणी के बाद देश भर में ताजमहल पर कई प्रकार की डिबेट आरम्भ हो गयीं। एक पक्ष ने कहा कि बाहर से आये एक आक्रांता के द्वारा बनवाया गया मकबरा भारत का गर्व नहीं हो सकता,कुछ का मत  था कि ताजमहल एक सुन्दर इमारत है पर उसे बनवाने वाला एक बाहरी आदमी मुग़ल था। यहाँ तक कि कुछ लोगों ने ताजमहल का एक हिन्दू मंदिर होने का दावा भी किया। वहीं दूसरे पक्ष ने सिर्फ ताजमहल को ही अपना नहीं बताय बल्कि मुगलों को भी बाहरी मानने से इंकार किया। एक प्रतिष्ठित पटकथा लेखक ने अकबर को ‘बॉर्न इंडियन’ बताया।

क्या मुग़ल भारतीय थे?क्या ताजमहल पर एक भारतीय को गर्व होना चाहिए? इन प्रश्नों के ऊपर अपनी राय बनाने से पूर्व कुछ जानकारी लेना हानिकारक नहीं होगा।

आइये कुछ तस्वीरें देखते हैं.

चूँकि चर्चा ताजमहल की चल रही है तो इन तस्वीरों को ताजमहल की समझने की भूल मत कीजियेगा।असल में ये तस्वीरें समरकंद में स्तिथ तैमूरलंग के मकबरे गुर-ए-अमीर की हैं. इसके मुख्य द्वार का आर्किटेक्ट आपको ताजमहल के लाल पत्थर के द्वार की याद दिलाएगा,वहीं तैमूर का मकबरा, मुमताज़ और शाहजहाँ के मकबरों की याद दिलाएगा। तैमूरलंग का उज़्बेकिस्तान के इतिहास में विशेष गौरवशाली स्थान है,जो कि सही भी है। उस देश के निवासियों को उस पर गर्व करने का पूरा हक़ है।

तैमूरलंग (लंग स्थानीय भाषा में लँगड़े को कहा जाता है). वही लंगड़ा क्रूर लुटेरा जिसने 1398 में दिल्ली को लूट और मौत का वो मंज़र दिखाया था जिससे उबरने में दिल्ली को 100 वर्ष लगे थे.दिल्ली,मेरठ, हरीद्वार इत्यादि में मरने वालों की संख्या लगभग एक लाख बताई जाती है जबकि उस समय पूरे भारत की जनसँख्या एक करोड़ से भी कम थी. सिर्फ इस्लाम मानने वालों को उस समय छोड़ा गया था अन्य कोई भी दिखा उसे मार दिया गया था। ’बोर्न इंडियन’ जनाब जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर इन्हीं तैमूरलंग के वंशज थे,और ताजमहल बनवाने वाले बोर्न इंडियन शाहजहाँ के दादा थे।

स्वतंत्रता के बाद लिखे गए भारत के इतिहास में मुगलों को सिर्फ अपना ही नहीं बताया बल्कि हमें उन पर गर्व करना चाहिए ये भी सिखाया। अकबर को ग्रेट बताय जाना भी इसी का हिस्सा था। भारतीय तत्कालीन इतिहासकारों को ऐसा करने में पूरी सफलता भी मिली और स्वतंत्रता के बाद की दो तीन पीढ़ियां मुगलों और उनके द्वारा किये गए काम तथा बनवाई इमारतों पर गर्व करती रही और आगे भी करती रहेगी यदि आज इतिहास को बदल कर सच नहीं बताया गया। शाहजहाँ की ताजमहल नामक मकबरा और मस्जिद बनवाने के पीछे क्या आकांक्षा थी ये सोचने की बात है. वो तो चौथी पीढ़ी का भारतीय था तो उसने भारतीय संस्कृति के अनुसार पत्नी की समाधी क्यों नहीं बनवा दी जहाँ उसकी की प्रजा अपनी प्रिय रानी को श्रद्धा के साथ हर बरसी पे पूजने जाती, मुमताजमहल के नाम पर अस्पताल ही बनवा देता या कोई पार्क इत्यादि। लेकिन उसने बनवाया अपनी बाहरी मुग़ल परम्परा के हिसाब से मकबरा। इसके पीछे उसकी अपने पूर्वज तैमूरलंग की लेगेसी को आगे बढ़ाते हुए उससे भी शानदार मकबरा बनवा कर खुद को ’अपने मुग़ल इतिहास’ का सबसे महान एम्पायर सिद्ध करने की इच्छा छुपी थी। इसलिए जब शाहजहाँ की तीन पत्नियों में से एक ईरानी पत्नी की उनके चौदहवें बच्चे के जन्म के दौरान मौत हुयी तो उसने ‘अपनी मातृभूमि’ में बने तैमूर के मकबरे गुर-ए-अमीर से भी शानदार मकबरा बनवाने का महत्वकांक्षी निर्णय लिया और ऐलान किया कि उसकी मौत के बाद उसे भी वहीं दफनाया जाये। बनवाता भी क्यों नहीं उस समय उसके ख़ज़ाने में दूसरों का बेशुमार पैसा था जो उसके बाप दादाओं ने कब्ज़ा करके जमा किया था, लगभग निशुल्क राजस्थान का संगमरमर था, गुलाम कौम के मज़दूरों का हुजूम था।

ताजमहल कैसे बना?किसके पैसे से बना?किसके श्रम से बना? इन सभी प्रश्नों पर विचार करना उचित होगा। कहा जाता है शाहजहाँ ने ताजमहल बनवाने के लिए ज़मीन,जयसिंह को आगरा में एक महल देकर ली थी। इतिहास में ढूढ़ने पर आगरा में कहीं किसी जयसिंह के महल का कोई ज़िक्र नहीं है,ना ही धरातल पर ढूंढने पर ऐसा कोई महल मिलता है। क्या ताजमहल को बनाने के लिए जबरन एक भारतीय से ज़मीन छीनी गयी थी? ताजमहल बनाने में उस समय के हिसाब से जो अकूत सम्पदा लगी वो भारतियों की थी। शाहजहाँ ने भारतीयों के कर से दिए पैसे से ही खज़ाना बनाया था जिससे बाद में ताजमहल बनवाने में लगाया गया। श्रम भी भारतियों का ही लगा जिनके बाद में हाथ भी काट दिए गए। ऐसा क्यों? क्या शाहजहाँ को डर था कि उसकी आने वाली संताने इससे भी भव्य ईमारत न बनवा जाएँ और उज़्बेक इतिहास में अमीर तैमूर से भी शानदार मकबरा बनवाने वाले शाहजहाँ से बेहतर मकबरा कोई और बनवा दे ।

मुगलों का अपने पूर्वजों पर गर्व करना,उनकी नक़ल के मकबरे बनवाना तो समझ आता है परन्तु भारतियों को अपना ही शोषण करने वाले मुगलों का महिमामंडन करने की क्या आवश्यकता थी? हम भारतीय स्वतंत्रता के बाद तो आख़िरकार सच्चाई लिख सकते थे? पर ऐसा हुआ क्यों? ओह रुकिए…  इतिहास लिखने का काम तो स्वतंत्रता के बाद से हमारे लेफ्टिस्टों के हाथों में रहा और देश के शीर्ष पर भी लेफ्ट की ओर झुकाव रखने वाले जवाहरलाल नेहरू विराजमान थे। एक सच्चा लेफ्टिस्ट-कम्युनिस्ट कॉमरेड भला कैसे एक मित्र देश उज़बेक सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक से आये मुगलों के बारे में कुछ गलत लिखने की हिमाक़त कर सकता था? ऊपर से महामहिम जवाहर के नाराज़ हो जाने का रिस्क अलग।फिर जब अपने साथी कॉमरेड देश के महान मुगलों पर लिखने का सपना तो था ही और ऊपर से महामहिम जवाहर का आशीर्वाद साथ हो तो सोने में सुहागा आखिर क्यों न लिखा जाये। बाद में कांग्रेस को अल्पसंख्यकों को अपने साथ रखने के लिए ये ज़रूरी था,लेफ्टिस्टों को अपने साथी कम्युनिस्ट देश से आये लोगों का महिमामंडन करना था। भारत के कम्युनिस्टों के लिए देश के हितों से अधिक महत्वपूर्ण उनके अपने मॉडल देशों सोवियत संघ,चीन,क्यूबा इत्यादि की पूजा अर्चना करना था, उनसे मिलने वाले मासिक भत्ते का अहसान भी चुकाना था। भारत के कम्युनिस्ट 1962 की भारत-चीन जंग में वे अपनी स्वामिभक्ति चीन के प्रति दिखा कर ये बात अनगिनत बार में से एक और बार सिद्ध कर चुके थे। इन लेफ्टिस्ट इतिहासकारों ने अपने मॉडल देशों के इतिहास की तरह ही भारत के इतिहास को एक प्रोपोगैंडा बना कर रख दिया। भारत के इस इतिहास को पढ़ते ही भरोसा ना करके उसे तार्किक रूप से समझने की चेष्ठा करें और उस समय की अन्य उपलब्ध सामग्री अवश्य पढ़ें।

लेखक : इकेसेपा @Nitishva_

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