तेज़ वर्षा वाली रात में कंश का कारागार। श्रीकृष्ण का जन्म हो चुका है। वासुदेव उन्हें टोकरी में रखकर गोकुल जाने के लिए तैयार हैं। माता देवकी अनिष्ट की आशंका से ग्रस्त हैं। यह सोचते हुए चिंतित हैं कि वासुदेव भादों की उफनती यमुना कि कैसे पार करेंगे? टोकरी सिरपर रखकर वासुदेव ने देवकी से विदा ली।

नदी पार करने के लिए वासुदेव ने यमुना में पाँव रख दिया। जैसे-जैसे चलने लगे यमुना का जल स्तर बढ़ने लगा। अचानक उन्हें लगा कि भीग रहे बालक के ऊपर किसी ने छाता तान दिया। उन्होंने सिर घुमाकर कर देखा तो शेषनाग जी थे। शेषनाग जी ने हल्की सी मुस्कान के साथ इन्हें प्रणाम किया।

अचानक वासुदेव को लगा कि नदी का जल बढ़ता जा रहा है और कुछ ही क्षणों में ख़तरे के निशान यानी उनके गले तक पहुँच गया। उन्हें लगा अब उनकी मृत्यु तय है परंतु यह क्या? ऊपर तक जाकर यमुना का जल बालक के पाँव छूकर उतरने लगा। और फिर नीचे ही होता गया।

वासुदेव गोकुल पहुँचे। यशोदा और नंद के घर बालक को सुलाया और वापस मथुरा की ओर चल पड़े। जब वे यमुना पार करने लगे तो एकबार फिर से नदी का जल उतर गया और वे आसानी से इस पार आ गए।

जैसे ही नदी से बाहर आए देखते क्या हैं कि वहाँ एक पुलिस दस्ता खड़ा था। दस्ते से निकल कर एक पुलिस वाले ने उन्हें हथकड़ी लगानी चाही तो वे बोले; “इसकी क्या आवश्यकता थी? मैं तो कारागार में जाकर ख़ुद ही बेड़ियों में घुस जाता”

पुलिस वाला बोला; “हम कंश की नहीं बल्कि नेशनल ग्रीन ट्रायब्यूनल की पुलिस हैं। और ये हैं ट्रायब्यूनल के वक़ील साहेब जिनके हाथ में है जस्टिस मुरलीधर द्वारा जारी किया गया आपकी गिरफ़्तारी का ऑर्डर”

वासुदेव ने घबड़ाकर पूछा; “परंतु मेरा अपराध क्या है?”

पुलिसवाला बोला; “आपकी वजह से घंटे भर के लिए यमुना सूख गई। आपने पर्यावरण को जो नुक़सान पहुँचाया है उसके लिए आपको सात साल की सज़ा मिली है। और ढाई महीने की अतिरिक्त सज़ा मिली है नाग से भीषण बारिश में काम कराने के लिए”

वासुदेव पुलिस वालों के साथ जीप में बैठे चले जा रहे थे….

लेखक : श्री शिव मिश्र (shivkrmishr)
रेखांकन : श्री सुरेश रांकावत (@sureaish)

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पेशे से अर्थ सलाहकार. विचारों में स्वतंत्रता और विविधता के पक्षधर. कविता - हिन्दी और उर्दू - में रुचि. दिनकर और परसाई जी के भीषण प्रशंसक. अंग्रेजी और हिन्दी में अश्लीलता के अतिरिक्त सब पढ़ लेते हैं - चाहे सरल हो या बोझिल.

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