सत्रह ताबूत श्रीनगर से देश के विभिन्न हिस्सों में भेजे गए । पूरे सैनिक सम्मान के साथ विभिन्न स्थानों पर सत्रह अंत्येष्ठियां हुईं, सत्रह बार सैन्य तुरुही बजाने वालों ने कारुणिक धुन बजाए किन्तु सत्रह परिवारों के दर्जनों स्नेही परिजन अपने उस प्रिय को अब कभी नहीं देख सकेंगे । मत भूलिए कि अनेक वीर जवान अभी भी श्रीनगर के सैनिक अस्पताल में मौत से जूझ रहे हैं । यह है उड़ी की त्रासदी ।

इस अति भयावह हमले पर जो प्रतिक्रियाएं आयीं, वे अपेक्षित ही थीं । स्तब्धता, शोक और खौफ व्यक्त किया गया । आक्रोश के साथ बदले की बात माँग की गयी तथा युद्ध विरोधियों ने संयम रखने की बात भी कही । देश के शीर्ष नेतृत्व ने कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है और सैनिक रणनीतिकारों ने अपने नाम और पेशे के अनुरुप अनेकों सैनिक विकल्प सुझाए हैं । सोशल मीडिया भी पीछे नहीं रहा और लोगों ने वहाँ अपनी राजनीतिक मान्यताओं और सैद्धांतिक रुझानों के अनुसार अपना पक्ष रखा । समय ही बताएगा कि उड़ी भारतीय राजनीतिक और सैन्य इतिहास में एक निर्णायक ऐतिहासिक क्षण बनेगा या पूर्व में हुई विभिन्न घटनाओं की सूची में बस जुड़कर रह जाएगा, जैसा कालुचक तथा पठानकोट के साथ हुआ । भविष्य की कुंजी एक ही व्यक्ति के पास है और वह हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ।

सत्रह वीरों की उड़ी में शहादत के बाद, कश्मीर में इस्लामिक आतंकवाद की १९८८ में हुई शुरुआत से अब तक इसमे मारे जाने वालों की संख्या बढ़कर ६२४९ हो गयी है ( दक्षिण एशिया आतंकवाद पोर्टल ) । २८ साल की लंबी कालावधि के लिए यह संख्या छोटी लग सकती है किन्तु यह पाकिस्तान के साथ ५८३ दिन चले चार युद्धों में मृतकों की कुल संख्या ७५०० ( स्रोत – विभिन्न } से कुछ ही कम है । आतंकवाद से मृत आँकड़े में ऑपरेशन पराक्रम के दस महीने की कार्रवाई में हताहत (मृत या घायल) १८७४ व्यक्ति शामिल नहीं हैं (स्रोत – तत्कालीन रक्षा मंत्री का संसद में दिया गया उत्तर) ।

कल से सारे सैन्य विशेषज्ञ उड़ी की घटना को युद्ध की कार्रवाई बता रहे हैं । इससे यह कौतूहल होता है कि विशेषज्ञों के अनुसार युद्ध के घटक क्या होते हैं । यदि यह जवानों की मृत्यु की संख्या है तो उपर के आँकड़ों से स्पष्ट है कि हजारों वर्दीधारी अपनी जान गवा चुके हैं, १९४८ के बाद से और इसका बहुत बड़ा हिस्सा १९८८ के बाद के छद्म युद्ध में हुआ है । यदि इसका अभिप्राय हमले की प्रवृत्ति से है तो हमने इससे भी अधिक खौफनाक हमले २६/११ और संसद पर हमला के रुप में देखे हैं तथा साथ ही पूर्व में चार युद्ध भी ।

दरअसल आस्तित्व में आने के बाद कभी भी पाकिस्तान ने भारत के साथ युद्ध समाप्त नहीं किया । जो २२ अक्टूबर १९४७ को तथाकथित कबीलाई हमले के रुप में शुरु हुआ, वह आज भी जारी है । न तो उसने अपना तौर तरीका बदला है और न ही भारत के प्रति अपनी शत्रुता । वह भारत ही है जो सदैव ही शांतिपूर्ण सह-आस्तित्व के भ्रम में रहा है । दूसरी तरफ भारतीय नीतियों के कारण बनी अपेक्षाकृत शांतिकालीन स्थिति का भी उपयोग पाकिस्तान ने अपनी सामरिक क्षमता बढ़ाने में और भारत के प्रति घृणा को मजबूत करने में किया ।

उड़ी पाकिस्तान की भारत के प्रति घृणा का प्रस्फुटन है और इसका वह पूरे विश्वास से समर्थन भी करता है । यह पाकिस्तान के सामर्थ्य में है । दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना के ब्रिगेड मुख्यालय पर हमले के लिए अपने चार नागरिक भेजने के पाकिस्तान के काम की और क्या व्याख्या हो सकती है ? मत भूलिए कि १७ में से १४ बहादुर शहीद बम के प्रयोग से आतंकवादियों द्वारा टेंटों में आग लगाकर जिन्दा जलाए गए । पूर्व में भी इसी देश ने भारत की संसद पर और भारत की व्यवसायिक राजधानी पर हमले के लिए अपने आदमी भेजे । पाकिस्तान और उसके शासक जानते हैं कि वे भारत और उसके हितों पर दंडाभाव से हमला कर सकते हैं ।

पाकिस्तान के विपरीत भारत चिरस्थायी विश्लेषण विकलांगता से ग्रस्त और अपनी क्षमताओं में भरोसा न करने वाला देश प्रतीत होता है । हमारा खुद में भरोसा न होना इस तथ्य से स्पष्ट है कि हम एक ओर तो पाकिस्तान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाने की माँग करते हैं किन्तु यह भूल जाते हैं कि वही पाकिस्तान २००६ से ही हमारे ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन (एमएफएन)’ की सूची में है, बिना हमे एमएफएन का दर्जा दिए । गैरजिम्मेदारी के प्रदर्शन से पाकिस्तान ने भारत के विकल्प और सीमित कर दिए हैं । इस तरह भारत ‘Nash equilibrium’ की स्थिति की ओर प्रवृत्त है जहाँ भारत के नीति नियन्ता यह मानते हैं कि घिसी पिटी रणनीति से विचलन भारत के हित में नहीं है ।

भारत कीे विश्वास में कमी की समस्या इस मुगालते में रहने के समूह के मत से और बड़ी हो जाती है जो यह मानने से इंकार करते हैं कि पाकिस्तान भारत के साथ युद्धरत नहीं है । वे युद्ध की आर्थिक कीमत का तर्क देते हैं किन्तु यह भूल जाते हैं कि कि युद्धरत पड़ोसी के साथ शांति स्थापित करने की आर्थिक और मानवीय कीमत कहीं ज्यादा उँची होती है । संयम बरतने की बात कहने वाले इस वाचाल समूह पर्व से व्यारप्पा के दिलाते हैं – कायरता सदैव धर्म और नैतिकता का आवरण ओढ़कर आती है ।

रणनीति पर वापस आएं तो यह स्पष्ट है कि भारतीय नीति तंत्र को स्वयं को स्थिरतावादी राज्य की तंद्रा से बाहर निकालने के लिए झकझोरने की जरुरत है । जब तक पाकिस्तान पर कीमत नहीं लगेगी तब तक वह भारत के साथ अपने युद्धरत होने का नुकसान नहीं समझेगा । क्या और किस हद तक कीमत लगानी है, इसका निर्णय प्रधानमंत्री को करना है । लेकिन प्रधानमंत्री पर दबाब बढ़ना तय है जब टीवी कैमरा परिजनों द्वारा अपने प्रिय के शव प्राप्त करने का हृदय विदारक दृश्य दिखाएंगे । उड़ी त्रासदी से निबटना नेतृत्व कौशल की सबसे बड़ी परीक्षा है और इस परीक्षा के प्रश्नों का उत्तर गीता के निम्नलिखित श्लोक में निहित है ।

स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि |

( अर्थात तुम्हें, अपने योद्धा होने के धर्म के कारण, कर्तव्य पथ से किंचित भी डगमगाना नहीं चाहिए । एक योद्धा के लिए धर्म की संरक्षा हेतु युद्ध करने से श्रेयस्कर कुछ नहीं है )

जब तुरुही बजाने वालों ने उड़ी के १७ शहीदों को अंतिम विदाई देने के लिए कारुणिक धुन बजाया तो इसका कचोटता हुआ कारुणिक माधुर्य ७ रेसकोर्स रोड के स्वामी के कानों तक भी पहुँचा व गूँजा होगा तथा उनकी भी कई रातों की नींद उड़ गयी होगी ।

लेखक : मूल आलेख अंग्रेज़ी में आलोक भट्ट (@alok_bhatt) द्वारा लिखा गया है । इसका हिन्दी अनुवाद राकेश रंजन (@rranjan501) ने कुमार अंकित के सहयोग से किया है ।

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