यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि नयी सरकार बनने के बाद शुरुआती कुछ महीने वह चुनाव में अपनी पार्टी के किए गए वादे पूरे करने में चुस्ती दिखाती दिखती है. फिर वह धीरे-धीरे सेटल हो जाती है, बाद में ढ़ीठ भी. इसी परम्परा का निर्वहन करते हुए बिहार में नीतिश सरकार ने पूरे राज्य में मद्य निषेध की घोषणा करके टुन्न बिहार को सुन्न कर दिया. मद्य विरोधी वर्ग व महिलाएं स्वागत करने लगे, मद्य शौकीन समाज स्तब्ध रह गया. समाजवेत्ता अपने अपने ढ़ंग से इसकी व्याख्या करने लगे. हमेशा की तरह विशेषज्ञों की ये व्याख्याएं आम आदमी के पल्ले नहीं पड़ीं. गोमांस विरोध को खाने पीने की आजादी पर हमला व लोकतंत्र पर कुठाराघात बताने वाले बुद्धिजीवी सामाजिक सुधार का कोण देखकर मद्य निषेध पर खामोश रह गये.

राजनीतिक पार्टियों ने किन्तु-परन्तु के वावजूद मद्य निषेध का विरोध नहीं किया. विपक्ष के एक राजनेता ने तो दावा जड़ दिया; “मद्य निषेध हमारे दबाब में हुआ है.” नीतिश जी की अनौपचारिक प्रतिक्रिया थी; “अब ई लोग को का कहें. नौ साल इनके समर्थन से सरकार चलाए तो कभियो दबावे में नहीं आए, उल्टा इनको दबाए रखे. आ अब इनके दबाव से …” सनद रहे, विपक्ष के यह नेता वही हैं जिनके मुख्यमंत्री बनने से पिछले साल बिहार बाल बाल बचा था. महागठबंधन के मंगलराज फेम महाराज लालू जी मद्य निषेध का समर्थन कर नहीं पा रहे, विरोध कर नहीं सकते.

दो चार दिन सकते में रहने के बाद मद्य शौकीन समाज हरकत में आया या उसके हरकतों की खबरें आनी शुरु हुईं. अब तक जो शराब पीकर हिलते रहते थे, उनके हाथ पाँव शराब की कमी से हिलने लगे. महागठबंधन को वोट करने वाले मद्य शौकीन उस घड़ी को कोसने लगे जब उन्होने अपना कीमती वोट सामाजिक न्याय या सुशासन के नाम पर जाया किया था.

मद्य निषेध के विरोध की दलीलें गढ़ी जाने लगीं. कुछ पढ़े लिखे शौकीनों ने मद्य निषेध को मानवाधिकार हनन से जोड़ना शुरु कर दिया. शौकीनों द्वारा संचालित एक नागरिक अधिकार संगठन ने नागरिकों के वैसे मनोरंजन के समाप्त हो जाने का हवाला दिया जो गलियों, मुहल्लों, बाजारों व चौक-चौराहों पर मुफ्त उपलब्ध थे – ‘पाउच के डोमघाउच’ मे. शादियों के उत्सव में उत्साह की कमी आने का भी तर्क दिया गया. दिलजले आशिकों का एकमात्र सहारा छीनेे जाने का आरोप भी लगाया गया. मद्य निषेध के बाद अपेक्षाकृत फींके व सूखे रहे पंचायत चुनावों के बहाने लोकतंत्र कमजोर होने का रोना भी रोया गया. बेवड़ा एसोसिएशन ऑफ हिन्दुस्तान (BAOH) के अध्यक्ष विकी ने क्रुद्ध होकर ट्विटर पर मद्य निषेध के खिलाफ आवाज उठायी और अपने सदस्यों के बिहार प्रवेश पर प्रतिबंध लगाकर अघोषित बिहार बहिष्कार शुरु कर दिया.

आहत मद्य शौकीनों और उनके मर्माहत सेवा प्रदाताओं के लिए आशा की एक किरण बनकर आए थे तत्कालीन उभरते हुए क्रांतिकारी कन्हैया कुमार, जिन्हे अब राजनीतिक प्रेक्षक लिपटा और निबटा हुआ मानने लगे हैं. पटना लालवीर के स्वागत में पोस्टरों से पटा पड़ा था. इस फक्कड़ वामपंथी के खर्चीले यात्रा फंडिंग पर तब काफी चर्चाएं गर्म थीं. चर्चाओं को सही साबित करते हुए उन्होने ‘खाने पीने की आजादी’ का बयान दे डाला. कहते हैं कि इस पर नीतिश जी की झिड़की सुनकर कन्हैया वामपंथ के हिलते डोलते किले में वापस आ गए. यात्रा का कथित प्रायोजक हाथ मलता रह गया.

कर्मठ शौकीन बकैती से परे वे-आउट ढ़ूँढ़ने लगे. शराब के तमाम विकल्पों पर शोध होने लगे. कफ सीरप का अकाल पड़ गया. इरेजर का पानी सूँघकर हिरिस बुताया जाने लगा. ताड़ी में नौशादर व कटहल का लस्सा मिलाकर डेडली कॉकटेल बनाया गया. शौकीन समाज प्रयोगधर्मिता की सारी हदें पार कर गया. कई शौकीनों में धन उपार्जन की लालसा अचानक तीव्र हो गयी और वे दिल्ली या मुम्बई रवाना होने लगे. सीमावर्ती इलाकों से एक दिवसीय अन्तराज्यीय पर्यटन में बेतहाशा वृद्धि होने लगी. कई शौकीन अपने समाज हित के लिए मद्य तस्करी करने लगे. कर्मठ शौकीनों ने जहाँ चाह वहाँ राह को पुन: चरितार्थ किया.

पारिवारिक स्तर पर भी अनेक परिवर्तन हुए. शौकीनों की पत्नियां उन्हे फिर से प्यार करने लगीं. शौकीन उनसे उनके उमड़ते नीतिश प्रेम पर जलने भुनने लगे. दिल्ली में रहने वाले एक शौकीन ने अपने पिता से फोन पर कहा; “बाबू हो, आब बिहार घूइर क नै ऐब (बाबूजी, अब मैं बिहार नहीं आउंगा).” बाबूजी बोले; “तहन हमहीं ऐल करब बेटा (अब मैं ही आया करुंगा बेटा).” पाठक कयास लगाने को स्वतंत्र हैं कि बाबूजी पुत्र प्रेम में दिल्ली जाएंगे या … छपरा के किसी गाँव के एक गबरु ने मोटरसाइकिल की जिद पूरी न होने पर घर में धमकी दे डाली; “बुझात बा कि हमरा एक दिन दारु पियही के परी (एक दिन मुझे दारु पीना ही पड़ेगा).” गबरु के समझदार पिता ने बाप-बेटे की जमानत पर खर्च करने से बेहतर बेटे के लिए मोटरसाइकिल खरीद देना ही समझा.

नीतिश कुमार की सुशासन छवि और मजबूत हो गयी. अब उनका सुशासन फोकस्ड दिखता हैक्योंकि मुद्दा एक सूत्रीय हो गया है. विकास के फालतू मुद्दों का ज्यादा भटकाव नहीं है. अच्छी बात यह भी है कि उन्होने इस पर फोकस कभी कम नहीं होने दिया. उन्होंने नोएडा तक में शराबबंदी की अलख जगायी. वहाँ शौकीनों की हूटिंग भी झेली पर हौंसला कम नहीं होने दिया. हाल में तो सख्ती करते हुए वह गिरिराज टैप घोषणा कर गए; “जो शराब पीना चाहते हैं, वे बिहार से बाहर चले जाएं.”

मद्य निषेध कानून की सख्ती की आलोचना होती है किन्तु आलोचक यह भूल जाते हैं कि बिना सख्ती के कानूनों को हम मजाक मजाक में फॉर ग्रांटेड लेने लगते हैं. जहाँ तक बिहार के शराबबंदी के प्रावधानों की बात है, उसमें सख्ती को अंत में बहुत कम कर दिया गया. मूल प्रावधानों में तो यह भी था कि शराब पीने में प्रयुक्त अंगों यथा हाथ, होंठ, मुँह और गला को पीने वाले व्यक्ति के अलावा पृथक सजा दी जाए. मूल प्रावधान की एक धारा थी – जिस गाँव में शराब मिले, उसे साल भर धूप और बारिश से वंचित कर दिया जाए . शराब पीने वाले व्यक्ति को उसकी आने वाली तीन पीढ़ियों सहित दंडित किया जाना भी मूल प्रावधानों में था.

मद्य निषेध के विरोध में एक तर्क है – राजस्व को होने वाला लगभग २५०० करोड़ रुपये का नुकसान. नीतिश सरकार ने इसकी भरपाई करने के लिए आरटीओ व पुलिस को लगा दिया है और वे दुपहिया वाहन चालकों की चालानबद्ध दुहाई कर रहे हैं. ठेके व चुआंठ केन्द्र (जहाँ देशी बनता है) बन्द होने से पुलिस के निजी राजस्व क्षति की भरपाई पुलिस वाले सफलतापूर्वक मद्य तस्करों व चोरी छिपे अपनी तलब बुझाने वाले शौकीनों से कर रहे हैं.

हाल में हुई नोटबंदी का नीतीश जी ने पार्टी लाइन के खिलाफ या यूँ कहिए कि पार्टी को लाइन पर लाते हुए स्वागत किया है. उन्होने आशा जतायी है कि इससे शराबबंदी को भी बल मिलेगा. किन्तु नीतिश जी की शौकीनों को ‘अंधेरे में जूस पीने की नसीहत’ का भावार्थ समझने वाले तथा उपर तक अपनी पहुँच के बल फ्रूटी टेट्रापैक में गैर-फ्रूटी पेय पीने वाले मुंशी जी ने नोटबंदी के बाद मानवीय आधार पर शराबबंदी समाप्त कर देने की माँग की है. मानवीय आधार का मुंशी जी का तर्क दमदार लगता है, इस दर्द के मद्देनजर:

एक मय ही था सब कुछ भुला देता जो
ये अब रहा नहीं,बोरी नोट की भुलूँ कैसे

लेखक द्वय – आशुतोष दीक्षित (@Cawnporiah) एवं राकेश रंजन (@rranjan501)
रेखाचित्र – सुरेश रंकावत (@Sureaish)

1 COMMENT

  1. ये लेखक द्वय नोट बंदी से ज्यादा बिहार में शराब बंदी से प्रभावित होकर अपनी व्यथा, प्रदेश की कथा बयान कर रहे है.

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