वर्षों तक रण में हार-हार,
तजकर निज गरिमा बार-बार,
युवराज पुनः तैयार हुआ,
फिर नव-रण का आगार हुआ,
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
जो रटे यही वह तोता है,

गोवा, मणिपुर में रोकर के,
यूपी, बिहार भी खोकर के,
हाथों से देवभूमि तजकर,
आसाम गया फिर सज-धज कर,
दुःख का यूँ पारावार हुआ,
दल का कुल बँटाधार हुआ,

फिर दल-बल ले अभियान चला,
इसबार भाग्य में लिखा भला,
फिर जातिवाद की पकड़ डोर,
अन्यायों का फिर मचा शोर,
फिर धर ले चला गदेलों को,
आरक्षण मिले पटेलों को,

अल-पेश कर दिया हार्दिक को,
फैली पर-सिद्धि चतुर्दिक को,
ये युवावर्ग की निशानी है,
संग में जिगणेश मेवानी है,
त्रिमूर्ती हमें जितायेंगे,
हम फिर सत्ता में आयेंगे,

संग में दरबारी पत्रकार,
जो आदियुगों से खेवनहार,
जो चिरयुग से हैं बने ढाल,
फैलाएँ चहुदिश बुद्धिजाल,
निंदा से यही बचाते हैं,
बदले में मुद्रा पाते हैं,

ऐसे चलना, औ ये कहना,
बस धारा संग सदा बहना,
मंदिर दर्शन को जाना है,
निज को शिवभक्त बताना है,
यह सब गर करते जाओगे,
फिर से सत्ता तुम पाओगे,

सबसे पहले जा सोमनाथ,
क्षण-क्षण पल-पल में दिखा हाथ,
फिर बात करो आरक्षण की,
जो नहीं कहीं, ऐसे रण की,
जो नहीं किया उन दानों की,
व्यापारी और किसानों की,

कर से इनको नुक़सान हुआ,
इन दलितों का अपमान हुआ,
आतंकित हो जीता किसान,
उसके ही घर में नहीं धान,
ये कह रेतों पर चला नाव,
क्योंकि यह रण है, ना चुनाव,

व्यापारी पर टूटा पहाड़,
इस जी एस टी ने दिया गाड़,
उसके घर सूनी थाली है,
सरकार नहीं यह गाली है,
ले शपथ कि इसे हराना है,
औ मेरे दल को लाना है,

जो करना सभी उपाय किया,
लिखवा कर नव अध्याय किया,
सोशल मीडिया को लगा गले,
उज़बेकिस्तनी बोट्स पले,
वोटर को बहुत सिड़्यूस किया,
पिदी को इंट्रोड्यूस किया,

फिर शत्रुदेश संग पींग मिला,
मणिशंकर के घर भोज खिला,
‘सेक्युलर’ वोटों पर गड़ा ध्यान,
मंदिर दर्शन का गिरा मान,
दाग़ी तोपों की सब नालें
चलकर देखी सारी चालें,

पर सत्य की महिमा न्यारी है,
उसकी बस अलग सवारी है,
कुछ भी चढ़ ऊपर आयेगा,
औ फिर असत्य पर छायेगा,
जो इसे समझ न पायेगा,
पप्पू कहलाया जायेगा।

लेखक : श्री शिव मिश्र @shivkmishr

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पेशे से अर्थ सलाहकार. विचारों में स्वतंत्रता और विविधता के पक्षधर. कविता - हिन्दी और उर्दू - में रुचि. दिनकर और परसाई जी के भीषण प्रशंसक. अंग्रेजी और हिन्दी में अश्लीलता के अतिरिक्त सब पढ़ लेते हैं - चाहे सरल हो या बोझिल.

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