सूर्यास्त का समय था. जंगल से घिरे आश्रम के पेड़ों पर बसेरा करने वाली चिड़ियाँ अपने घोसलों में वापस लौट चुकी थी. उनकी मिलीजुली चहचहाट से आश्रम में एक अजब संगीत सा गूंज रहा था.

संत सम्श्रेष्ठानंद अपने प्रिय तोतों को जंगल से उनके बसेरों में सुरक्षित लौटते देखकर संतुष्ट थे. पर मन में एक गंभीर चिंता का भाव था.

सम्श्रेष्ठानंद को आश्रम के आसपास के गाँव के लोगों ने बताया था कि आजकल जंगल में कुछ बहेलियों, चिड़ीमारों की आवाजाही देखि जा रही है. विदेशों से भारतीय चिड़ियों के निर्यात का बड़ा आर्डर पाए हुए ये बहेलिये शिकारी इस जंगल और आसपास बसेरा करने वाले पक्षियों को पकड़ कर ले जाना चाहते थे. कई स्थानों पर शिकारियों के जाल बिछे देखे गए थे. यहाँ तक कि कई चिड़ियों के जाल में फंसने तक की अपुष्ट ख़बरें आ रहीं थी.

आश्रम के तोते संत सम्श्रेष्ठानंद के सबसे प्रिय पक्षी थे. सुनकर स्मरण करने और दोहराने की प्राकृतिक क्षमता ने इन पक्षियों को औरों से अलग स्थान दिया था. संस्कृत के श्लोक हों या अन्य धर्मग्रंथ के पद, ये तोते महज़ सुनकर सब याद कर लेते थे और सुबह शाम दोपहर उन पदों-श्लोकों को दोहराया करते थे. आश्रम में स्पिरिचुअल माहौल बनाने में इन तोतों का अनूठा योगदान था.

शिकारियों के आने की खबर ने सम्श्रेष्ठानंद को गंभीर चिंता में डाल दिया था. वैसे तो उन्हें सभी पक्षी उतने ही प्यारे थे, पर तोतों की स्पेशल काबिलियत के चलते तोतों की उन्हें विशेष चिंता थी. गंभीरता से विचार कर संत इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि चूँकि तोतों में रटने और याद रखने की विशेष क्षमता है, वो इसी क्षमता को तोतों का हथियार बनायेंगे.

बस फिर क्या था. अगले ही दिन से तोतों के पाठ्यक्रम में एक नया पाठ जुड़ गया. जुड़ भी क्या गया, अनिवार्य कर दिया गया.

अब तोते रटने लगे थे कि “शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, हमें फँसाएगा. लेकिन हम नहीं फंसेंगे”. कुछ ही दिनों में ये पाठ, ये सेंटेंस सभी तोतों की चोंच पर थे. तोते अब उड़ते-बैठते, चुगते-हगते, रात-दिन यही रटते थे कि “शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, हमें फँसाएगा. लेकिन हम नहीं फंसेंगे”.

एक दिन इस पाठ की परीक्षा का दिन आ ही गया. शिकारियों का एक ग्रुप जंगल में इन हेल्दी, चिकने-चुपड़े, चमकीले तोतों को एक पेड़ पर बैठा देख कर इन्हें पकड़ने का प्लान बनाने लगा. पर तभी तोते फिर बोल उठे “शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, हमें फँसाएगा. लेकिन हम नहीं फंसेंगे”. शिकारियों ग्रुप के एक युवा तुर्क ने कहा कि “कप्तान साब ! ये तो सब बड़े पहुंचे हुए तोते लगते हैं. बहुत सीखे-पढ़े हैं ये. आसानी से हाथ न लगने वाले”.

पर कप्तान अनुभवी था. उसने कुछ सोचा और बोला कि ये सब छोडो और जाल तो बिछाओ. युवा-तुर्कों ने फ़ौरन जाल बिछा दिया और चमकीले चीज़-पॉपकॉर्न के दाने भी बिखरा दिए. चीज़-पॉपकॉर्न की ललचाती खुशबू सूंघ तोते पेड़ से उतर कर दाना चुगने आ गए. काम हो चुका था. तोते चीज़-पॉपकॉर्न चुगते हुए और उत्साह में बोल रहे थे “शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, हमें फँसाएगा. लेकिन हम नहीं फंसेंगे”.

शाम को जंगल से वापस लौटते शिकारियों के झोलों से तेजी से रिपीट होते ये शब्द जंगल के सन्नाटे को चीर रहे थे “शिकारी आएगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, हमें फँसाएगा. लेकिन हम नहीं फंसेंगे”.

इस कथा का हिन्दू समाज की स्मरण-क्षमता और उनके आसपास घिरी हुई परिस्थिति से कोई लेना-देना नहीं है.

लेखक : @Cawnporiah

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