चुनाव हुए और सरकार बदल गई । सरकार बदल गई तो काम करने का तरीका भी बदल गया । काम करने का तरीका बदला तो समस्याओं को सुलझाने का तरीका भी बदल गया । पहले समस्याओं को सुलझाने में जिन तरीकों की मदद ली जाती थी उनमें सबसे प्रमुख थी चिंता व्यक्त करना। एक समय था जब सरकार काम कर रही है, जब इस बात को साबित करना रहता है तो प्रधानमंत्री किसी समस्या का जिक्र करते हुए उसपर चिंतित हो लेते हैं । बीच-बीच में राष्ट्रपति भी चिंतित हो लेते थे । जब टीवी पर बैठा समाचारवाचक यह कहता; “आज राष्ट्रपति ने बढ़ते आतंकवाद पर चिंता व्यक्त की” तो सुनकर लगता कि आतंकवाद को न सिर्फ प्रधानमंत्री बल्कि राष्ट्रपति भी गंभीरता से ले रहे हैं ।

देश की अर्थव्यवस्था को लेकर प्रधानमंत्री चिंतित होते तो अमेरिका में आए आर्थिक संकट पर चिंता व्यक्त कर देते थे । सुनने वाला खुद से मन ही मन पूछ लेता; “हमारा प्रधानमंत्री अमेरिकी अर्थव्यवस्था को लेकर चिंतित क्यों हैं?”

उसकी इस शंका का समाधान अर्थशास्त्री यह कहते हुए कर देता था कि; “ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में हमारी अर्थव्यवस्था वैश्विक अर्थव्यवस्था से अलग नहीं है और वैश्विक अर्थव्यवस्था का अर्थ होता है अमेरिकी अर्थव्यवस्था”

अर्थशास्त्री की बात सुनकर नागरिक धन्य हो लेता था ।

वह ऐसा समय था जब प्रधानमंत्री लगभग सभी समस्याओं को लेकर चिंतित रहते हैं । यह बात अलग है कि आर्थिक समस्याओं के लिए उन्होंने अपनी पूरी चिंता का सत्ताईस प्रतिशत आरक्षित रख छोड़ा है । वे जहाँ जाते, उस जगह के मुताबिक चिंतित हो लेते थे । महाराष्ट्र गए तो विदर्भ के किसानों की समस्या पर चिंतित हो लिए । आसाम जाते हैं तो वहाँ हो रही हिंसा पर चिंतित हो लेते थे । विदेश जाते थे तो पाकिस्तान की समस्याओं को लेकर चिंतित रहते थे । जिस जगह पर चिंतित होते हैं, वहाँ के लोगों को भी विश्वास हो जाता था । लोग खुद को समझाते हुए कहते; “जब प्रधानमंत्री जब ख़ुद ही चिंतित हैं, तो इसका अर्थ यह है कि सरकार काम कर रही है ।”

उस दौर में लोग आपस में बातें करते हुए सुने जा सकते थे कि; “मान गए भाई । यह सरकार वाकई काम कर रही है । देखा नहीं किस तरह से प्रधानमंत्री चिंतित दिख रहे हैं”

तब के प्रधानमंत्री की चिंता के बारे में सोचते हुए मुझे लगा कि तब उनके और उनके निजी सचिव के बीच में वार्तालाप कैसी होती होगी? शायद कुछ इस तरह;

प्रधानमंत्री: “भाई, कल मैंने जो नक्सली समस्या पर चिंता व्यक्त की थी, उसकी रिपोर्टिंग कैसी हुई है मीडिया में?”

सचिव: ” सर, बहुत बढ़िया रिपोर्टिंग हुई है । आपकी चिंता पर चार टीवी न्यूज चैनल्स पर पैनल डिस्कशन हुए ।”

प्रधानमंत्री: “अच्छा कल २० तारीख है, कल किस बात पर चिंतित होना है?”

सचिव: “सर, कल आपको किसानों के प्रतिनिधियों से मिलना है । ऐसे में मेरा सुझाव है कि आप कल किसानों की हालत पर चिंतित हो लें ।”

प्रधानमंत्री: “हाँ, बात तो आपकी ठीक है । बहुत दिन हुए, किसानों की समस्याओं पर चिंतित हुए ।”

सचिव: “हाँ सर, किसानों की समस्याओं पर पिछली बार आप १५ अगस्त को लाल किले पर चिंतित हुए थे ।”

प्रधानमंत्री: “और, उसके बाद वाले दिन का क्या प्रोग्राम है?”

सचिव: “सर, २१ तारीख को आपको न्यूक्लीयर डील के मामले पर अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल से मिलना है । सो, मेरा सुझाव है कि उनसे मिलने के पहले अगर आप मीडिया को संबोधित कर लेते तो सरकार को मिले ‘फ्रैकचर्ड मैनडेट’ पर चिंता जाहिर कर सकते थे ।”

प्रधानमंत्री: “वाह! जबरदस्त सुझाव है । इसीलिए मेरा मनना है कि आपसे बढ़िया सचिव पूरे विश्व में किसी प्रधानमंत्री के पास नहीं होगा। आपका सुझाव अति उत्तम है । ठीक है, मीडिया से मिल लेंगे और फ्रक्चर्ड मैनडेट पर चिंता व्यक्त कर लेंगे लेकिन उसके बाद वाले दिन का क्या प्रोग्राम है?”

सचिव: “सर, २३ तारीख को गुजरात चुनावों का रिजल्ट आएगा । उस दिन रिजल्ट के हिसाब से चिंतित होना पड़ेगा । बीजेपी जीत जाती है तो साम्प्रदायिकता पर चिंतित हो लेंगे और अगर हार जाती है तो फिर चिंता जताने की जरूरत नहीं है । हाँ, असली चिंता की जरूरत पड़ सकती है । चिंता इस बात की कि मुख्यमंत्री कौन बनेगा? दिल्ली से नेता भेजना है या उधर ही किसी नेता की खोज करनी है ?”

प्रधानमंत्री: “ठीक है । वैसा कर लेंगे ।”

सचिव: “सर, एक बात और बतानी थी आपको । एक मीडिया सूत्र से ख़बर सुनी कि गृहमंत्री शिकायत कर रहे थे । उनकी शिकायत यह है कि कि उन्हें चिंतित होने का मौका नहीं दिया जा रहा है । कह रहे थे कि देश में कानून-व्यवस्था की स्थिति ख़राब है, बम विस्फोट हो रहे हैं लेकिन उन्हें चिंतित नहीं होने दिया जाता । और तो और, सर, वित्तमंत्री भी ऐसी ही शिकायत कर रहे थे । ख़बर है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर वे ख़ुद चिंतित होना चाहते थे, लेकिन आप के चिंतित होने से उनके हाथ से मौका जाता रहा ।”

प्रधानमंत्री: “एक तरह से इन लोगों का कहना ठीक ही है । मैं ख़ुद भी सोच रहा था कि चिंतित होने का काम मिल-बाँट कर कर लें तो अच्छा रहेगा । वैसे आपका क्या ख़याल है?”

सचिव: “सर, आपकी सोच बिल्कुल ठीक है । आर्थिक मामलों पर वित्तमंत्री को एक-दो बार चिंतित हो लेने दें । बहुत दिन हुए गृहमंत्री को कश्मीर की समस्या पर चिंतित हुए । उन्हें भी चिंतित होने का मौका मिलना चाहिए । लेकिन सर एक समस्या और है । शिक्षा की समस्या पर मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह जी ख़ुद चिंतित नहीं होना चाहते । उनका मानना है कि उन्हें केवल आरक्षण के मुद्दे पर चिंतित होने का हक़ है ।”

प्रधानमंत्री: “देखिये, यही बात मुझे अच्छी नहीं लगती । मैं उनको आरक्षण के मुद्दे पर चिंतित होने से नहीं रोकता । लेकिन उन्हें भी सोचना चाहिए कि शिक्षा का भी मुद्दा है । मैं ख़ुद महसूस कर रहा हूँ कि पिछले कई महीनों में उन्होंने प्राथमिक शिक्षा की हालत पर कोई चिंता जाहिर नहीं की । और फिर उन्हें ही क्यों दोष देना? पिछले कई महीनों से कानूनमंत्री को भी किसी ने चिंतित होते नहीं देखा ।”

सचिव: “सर, आपका कहना बिल्कुल ठीक है । लोगों का मानना है कि बहुत सारे पुराने कानून बदलने चाहिए । और फिर कानून बदलें या न बदलें, कम से कम चिंतित तो हों । पिछली बार वे तब चिंतित हुए थे जब क्वात्रोकी जी को अर्जेंटीना में गिरफ्तार किया गया था । करीब डेढ़ साल हो गए उन्हें चिंतित हुए ।”

प्रधानमंत्री: “मसला तो वाकई गंभीर है । आज आपसे बातें नहीं करता तो मुझे तो पता भी नहीं चलता कि कौन सा मंत्री कब से चिंतित नहीं हुआ । एक काम कीजिये, चिंता को बढ़ावा देने वाली कैबिनेट कमेटी की मीटिंग कल ही बुलवाईये । मुझे तमाम मंत्रियों के चिंता का लेखा-जोखा चाहिए ।”

निजी सचिव कैबिनेट कमेटी के सचिव को चिट्ठी टाइप करने में व्यस्त हो जाता होगा । शनिवार को चिंता का लेखा-जोखा ख़ुद प्रधानमंत्री लेंगे, इस बात की जानकारी देने के लिए ।

अब ऐसा नहीं है । पिछले लगभग ढाई वर्षों में हमने प्रधानमंत्री को चिंतित होते नहीं देखा। अब स्टेट-क्राफ्ट में चिंता की जगह भाषण ने ले लिया है ।

पोस्ट के लेखक श्री शिव मिश्र ब्लॉगिंग के क्षेत्र में जाना पहचाना नाम है, इनके व्यंग्य गुदगुदाने के साथ साथ वर्तंमान सामाजिक राजनैतिक परिस्तिथियो पर कटाक्ष भी करते है , आप इन्हें ट्विटर पर @mishrashiv फॉलो कर सकते है।

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