इतिहास में जाकर उस समय की सच्चाई का अनुभव तो दूर, कल्पना तक कर पाना भी बहुत दुष्कर कार्य है । और यदि किसी देश का अधिकतर इतिहास विदेशियों द्वारा लिखा गया हो तो तथ्य, अनुभव और कल्पना गौण हो जाते हैं तथा इतिहास को अपनी ही इच्छानुसार अपनी ही लेखनी से लिखने का उद्देश्य प्रधान हो जाता है । भावुकता और साथ-साथ इतिहासखोरों का गर्मागर्म बाजार यदि सामने हों, तब तो नया इतिहास रचना ही मुख्य ध्येय हो जाता है ।
ऐसा नहीं है कि विदेशी इतिहासकारों ने जाने/अनजाने में त्रुटियाँ या शैतानियाँ नहीं की होंगी । अगर हर मनुष्य गलती कर सकता है, तो इस नियम का अपवाद कौन हो सकता है ? कोई नहीं । पर संतुलन खो देना, तथ्यों को नकार देना, पात्रों की भौतिक स्थिति को तरजीह न देना और अपने ही मनगढ़ंत विषयों को परोसना भी भारत को व उसके इतिहास की सच्चाई को ठीक-ठाक तरीके से पढ़ने नहीं देगा । इस तरह की व्यवस्था को उत्पन्न होते ही नष्ट कर देना श्रेयस्कर है ।
इतिहास के इस बाजार में ऐसे ही कुछ नए शोध की बात मौर्य सम्राट अशोक को ले कर चली है । एक नया आयाम परोसा जा रहा है, वो यह है कि सम्राट अशोक की शांतिप्रियता ने मौर्य वंश का नाश कर दिया । साथ ही यह भी कि वह असलियत में अशोक शांतिप्रिय नहीं, खूँखार थे और इसलिए महान कहलाने के योग्य नहीं थे। यह कहना कठिन है कि इन्हे इस तरह की प्रेरणा कहाँ से मिली । क्या अशोक का बौद्ध सम्प्रदाय से जुड़ना उनको अखरता है या उनके पास प्रामाणिक तथ्यों की सामग्री कम है ? बातचीत से तो ऐसा लगता है कि तथ्यों की कमीं नहीं है, फिर तो पहला ही कारण होगा । तथ्यों को नकारा जा रहा है। जैसे, अशोक द्वारा खुदवाए गए अभिलेख । कोई व्यक्ति यह ही कह दे कि विश्व में सबसे बड़े भूभाग पर राज करने वाले सम्राट ने अभिलेखों में अपनी शांतिप्रियता की बातें ही झूठमूठ लिखी हैं तो आप क्या सोचेंगे ?
विश्व के सबसे विशाल भूभाग पर बिना किसी विरोध के राज करने वाला चक्रवर्ती सम्राट अशोक किस भय से झूठ बोलेगा ? जिस व्यक्ति को अपने जीते जी किसी शत्रु का भय नहीं था, जिसके बौद्ध धर्म ग्रहण करने और शांतिप्रियता का दामन पकड़ने के बाद भी दशकों तक किसी पड़ोसी या शत्रु की उसे छूने तक की हिम्मत नहीं हुई, वो किस बात से भय खाता होगा ? क्या उसे ऐसे इतिहासकारों से भय था जो उसके मरने के २३०० वर्ष बादअशोकावदान नामक द्वितीय शताब्दी में मथुरा के महायान निकाय के बौद्ध भिक्षुओं द्वारा बढ़ा-चढ़ा कर लिखी हुई कुछ बातों को ही आगे रख कर अशोक से अशोक की महानता का ताज छीन लेंगे?
इस सदी में कई साधनों की कमी रही होगी, दूरगामी क्षेत्रों तक पहुँचना भी एक दुष्कर कार्य रहा होगा । इन दूरदराज़ के क्षेत्रों में लोगों को जोड़े रखना और साम्राज्य की सुरक्षा भी एक महान चुनौती रही होगी । वहाँ दशकों तक बिना किसी विरोध के, इतने बड़े समृद्ध, वैभवी राष्ट्र का स्वामी,क्या कोई मूर्ख रहा होगा ? जो व्यक्ति अपने अभिलेखों में मनुष्य तथा पशुओं के उपचार हेतु चिकित्सालयों को बनवाने की बात रखता है, जो अपने राष्ट्र में जनजीवन में सदाचार को मुख्य मुद्दा बनाकर अपने विशाल राष्ट्र में अपराधों पर नियंत्रण स्थापित करता है, ८४००० स्तूप बनवा कर इस बृहद राष्ट्र के जनमानस को धर्म में पकने की प्रेरणा देता है, जो अपनी जनता को अपनी संतान और स्वयं को उनके पिता की भूमिका में उतारता है, क्या वह झूठमूठ में अन्य सम्प्रदायों के प्रति प्रेमभाव की बात को आगे रखता होगा ? क्या ऐसा धूर्त व्यक्ति ऐसे निर्देश देने की भी क्षमता रखता है कि किस प्रकार विभिन्न सम्प्रदायों के लोग, धर्मप्राप्ति के साझे उद्देश्य को ही प्रधान मानें ? क्या कोई धूर्त व्यक्ति इस प्रकार की गंभीरता रख सकता है और यह निर्देश दे सकता है कि लोगों को अन्य सम्प्रदायों के साथ परस्पर शांति से बातचीत करनी चाहिए ? मेरी कल्पना में भी यह पूर्णतया असंभव है। दुष्चरित्र व्यक्ति के लिए किसी प्रकार के विचारों को सोच पाना सर्वथा असंभव है।

चक्रवर्ती सम्राट की गद्दी पर चार से अधिक दशकों तक शांतिपूर्ण तरीके से बने रहने के लिए राजा में उतना गांभीर्य चाहिए । जनमानस में विद्रोह न हो इसके लिए उसके शासन में, न्याय में, लोगों के हित के लिए उस प्रकार का चिंतन होना चाहिए। जो राजा ऐसा शिलालेख बनवाए कि राजा को सोते-जागते, खाते-पीते, किसी भी समय में राज्य से सम्बंधित विषयों के लिए सूचित किया जा सकता है,ऐसे राजा का अपनी प्रजा की ओर दृष्टिकोण अपने आप में एक आदर्श है। अपराधियों और शत्रुओं की तरफ कठोर नज़रें रखना तो उसका कर्तव्य है पर उस कठोरता में कड़वाहट का ना होना उसकी परिपक्वता ही दर्शाता है। शत्रु से युद्ध न कर के, सिर्फ चेतावनी  दे कर ही विजय प्राप्त कर लेना तो आचार्य चाणक्य की नीति से मेल ही खाता है। और युद्ध की अपेक्षा चेतावनी देकर विजयी होने की मानसिकता बिना किसी मूढ़ता के शांतिप्रियता ही ती है।

कल्पना कीजिए कि ऐसे वैभवशाली पद पर कोई मूर्ख, लम्पट, खूँखार व्यक्ति आसीन हो, क्या वह सोचेगा प्रजा के लिए, पशुओं के लिए, सदाचार के लिए, धर्मप्रचार के लिए, आपसी प्रेम के लिए ? ऐसे मूर्ख से तो बस कामभोगों में ही लिप्त रहने की आशा की जा सकती है । समृद्ध राष्ट्र से मिलने वाले संसाधनों का उसका स्वयं के लिए ही उपभोग अपेक्षित है । और एक बार मान भी लिया जाए कि अशोकावदान में दिए गए दोनों संदर्भ सच हैं भी तो क्या आज के संदर्भ में गुजरात के २००२ के दंगों में नरेन्द्र मोदी को न्यायालय में दोषी पाया गया ? किसी बृहद राष्ट्र में ऐसा सर्वथा सम्भव है कि कभी कभार किसी विषय पर जनता में आक्रोश फैल जाए और ऐसे उथल-पुथल के माहौल में कुछ जघन्य अपराध भी हुए हों । पर उन संदर्भों को उछाल कर यह कह देना कि यह काम सम्राट ने ही करवाया, उसने मिथ्या शिलालेख बनवाए, ये सब बुद्धिसंगत और तर्कसंगत नहीं लगता।

जिस राजा के मात्र चिट्ठी लिख देने से, उसके धर्मदूतों का विदेशी राज्यों में स्वागत हो, यहाँ तक कि वहाँ के राजा तक धर्म के अनुयायी बन जाएँ,ऐसे राजा की प्रतिभा, उसके तेज, उसकी निष्ठा,उसकी सत्यता पर मिथ्यारोपण करना, उसके मरणोपरान्त चार सौ से भी अधिक वर्षों बाद लिखी गयीं कुछ असामान्य बातों के आधार पर आज २३०० वर्षों बाद दोषारोपण करना मुझे तो मूर्खता के अलावा कुछ और नहीं लगता । ऐसे नवागंतुक इतिहासकार अपनी पुस्तकों की बिक्री के लिए मिथ्याचार में कितना भी लगे रहें किंतु विज्ञ व गंभीर व्यक्तियों द्वारा उनको गंभीरता से लेना असंभव है।

कलिंग में हुए रक्तपात और विस्थापन को देख कर ही अशोक, जो कि तब तक चण्डाशोक के नाम से कुख्यात था, के मन में क्षोभ हुआ, उसका मन विक्षिप्त हुआ, और धर्म संवेग जागा। धर्म में पकना पड़ता है, ये कोई काशाय वस्त्र धारण कर लेने मात्र से शुचि हो जाने का काम नहीं है। वर्षों की साधना है। अपने चित्त की वृत्तियों के निरोध का लंबा काम है यह । धैर्य और बुद्धिमानी से कदम-कदम आगे बढ़ने का कठिन कार्य है यह । समय लगता है,अपनी मंजिल तक पहुँचने के अंतराल में त्रुटियाँ भी होती हैं, परन्तु श्रद्धा से आगे बढ़ता व्यक्ति, अधिष्ठान से आगे बढ़ता व्यक्ति, प्रज्ञापूर्वक आगे बढ़ता व्यक्ति सफलता पा ही लेता है। अशोक ने भी अपने चौथे शिलालेख में धर्मपथ पर चलने वाले कुछ प्रभावों का विवरण दिया है ताकि आगे की पीढ़ियाँ भी प्रेरित हो । पर धम्माशोक बनने के पूर्व चण्डाशोक जैसी मानसिक अवस्था में अगर राजा बनने की लालसा से अशोक ने सुसीम का वध किया या अपने कई बंधु-बाँधवों का वध किया, तो ऐसे वृत्तान्त की न तो सराहना की जा सकती है और न ही जरूरत से अधिक भर्तस्ना क्योंकि अपने ऐसे चण्ड स्वभाव को बदलने के लिए ही वह धम्माशोक बना । बात बदल गई, स्वभाव बदलने लगा, दुर्जन व्यक्ति सज्जन बनने लगा ।

इसलिए मेरा नए इतिहासकारों से निवेदन है कि इतिहास्यकार न बनें। आप मंच पर कोई नए तथ्य सामने नहीं लाए । मात्र अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर कुछ नई व तथ्यहीन व्याख्या दे रहे हैं । आप स्वछन्द हो कर अपने पूर्वाग्रहों के सत्यापन के लिए नए तथ्यों की खोज करें और जनता के सामने प्रस्तुत करें । कम से कम उसमें मेहनत और नए तथ्य, दोनों देखने तो मिलेंगे । पुराने तथ्यों की जानकर विद्वानों ने गंभीरता से सोचते हुए पहले ही समीक्षा कर रखी है । और उनका मत है कि अशोक एक सक्षम, शक्तिशाली, वैभवशाली, तेजवान,शांतिप्रेमी, विश्व के सबसे बड़े भूभाग के चक्रवर्ती सम्राट थे ।

लेखक – चिंतनपाद @thinkerspad

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