“कै गो अमदी है?” – रिक्शेवाले ने पूछा!

“अमदी”? – आँखो में प्रशनचिन्ह लिए अपने दोस्त की ओर देखा! मेरा मित्र जो बगल मे खड़ा था, उसने कहा “अरे ये कितने आदमी हैं? ये पूछ रहा है”! मैने दोस्त से कहा ये कौन सी नई स्पीशीज आ गयी इंसान की, ‘Homo Sapiens Sapiens’ बन गया क्या? मन मे ये भी आया कि गब्बर सिंह रिक्शावाला बन जाये तो शायद ऐसा ही कुछ पूछता सांभा से! पटना के रिक्शेवाले, सवारी की संख्या के हिसाब से भाड़ा लेते थे, ज्यादा आदमी ज्यादा किराया!

खैर हमने रिक्शा भाड़ा किया और घर की ओर चल दिए. हम बंगलोर से आ रहे थे तो रिक्शा देख के बड़ा अपनापन सा लगता था, जैसे शरीर को सिग्नल मिल जाता था कि अब तुम्हारे शहर के नज़दीक आ गयी है ट्रेन!

पटना जंक्शन पे उतरते ही, महावीर मंदिर तक जा के आपको रिक्शा पकड़ना पड़ता था, ज़्यादा सामान हो तो रिक्शेवाले को मेन पोर्टिको के अंदर तक आने देते थे. अब ऑटो और ओला/उबर का ज़माना हैं तो ये दृश्य देखने को बहुत कम ही मिलेगा!

रिक्शा धीरे-धीरे धीरे घर तक पहुचता था तो रास्ते में शहर-बाज़ार का हाल समाचार भी पूछ लेते थे, रिक्शेवाले CID के आँख और कान होते थे, ये वो ज़माना था जब पत्रकारों को टैक्सी ड्राइवर नही मिले थे चुनावी रुझान समझने के लिए, वो भी अल्पमति रिक्शेवाले से ही काम चला लेते थे.

मित्रों, मेरा रिक्शेवालों से बहुत पुराना नाता रहा हैं (मोदी जी से माफी सहित). पिताजी जब बंगलोर से रिटायरमेंट के बाद पटना आए तो यहाँ के एक प्रतिष्ठित स्कूल में मेरा भी नामांकन हुआ, तो स्कूल आने जाने के लिए एक रिक्शा ही खरीद लिया और उसे चलाने के लिए एक रिक्शावाला खोजा. इन्ही भैया ने मुझे कई साल ‘हमारे’ रिक्शे से स्कूल के दर्शन करवाएँ. इनकी एक अज़ीब ख़ासियात थी, ये तोतलाते थे तो मुझे विक्रांत की जगह “विकलांग” बुलाते थे, इससे मुझे बड़ा चिढ़ लगती थी, अब कोई दूर से आपको “विकलांग सिंह” चिल्ला कर बुलाए तो आप कैसे फील करेंगे, ये सोच सकते हैं!

मेरे पैतृक स्थान मोतिहारी मे घर पे भी बड़े बुजुर्गों ने एक रिक्शावाला पाल रखा था, वो बेचारा मुफ़्त में रहता था और अपनी कमाई के साथ मुफ़्त मे घर के लोगो को इधर उधर पहचता था. शायद ‘रिक्शा ओन डिमांड’ की ये बहुत ही सरल रूपरेखा थी! हम उसे घर के सदस्य की तरह ही व्यवहार करते थे, वो हमारे शादी विवाह से लेकर श्राद्ध तक के कार्यक्रम में शरीक होता था!

रिक्शेवाले का नाम ओकिल राय था, ओकील ‘वकील’ का अपभ्रंश है! मैं उससे हमेशा पूछता की ओकील राय कैसा नाम है? कुछ साल पहले तक बिहार के यादवों में ऐसे अज़ूबे नाम काफ़ी आम थे, मैनेजर राय, कलेक्टर यादव, दारोगा राय (एक प्रमुख क्रांतिकारी) काफी आम नाम थे, हालाँकि सबसे आश्चर्यजनक नाम जो मैने आजतक सुना है, उसमें “आश्चर्य कुमार” सबसे उपर हैं. (इसपे कभी एक पोस्ट लिखूंगा!)

बरहाल, मैं पढ़ाई खत्म कर नौकरी की तलाश में दिल्ली आया तो दक्षिणी दिल्ली के ज़्यादातर इलाक़ों में रिक्शेवालों को न देख के “समथिंग इस मिसिंग” जैसा फील होता था. कुछ दिन बाद मौका मिला तो एक दोस्त के साथ लाजपत नगर में अपना निवास स्थान बनाया. कारण एक ही था, दक्षिण दिल्ली में होते हुए भी यहाँ साइकिल-रिक्शा चलते थे.

दिल्ली में ज़्यादातर रिक्शेवाले आपको उत्तरी बिहार के मिलेंगे. ये तथ्य मुझे मालूम ना था, एक दिन जब रिक्शा “भाड़ा” कर रहा था तो रिक्शा वाले ने पूछा “खुल्ले हैं भैया?”, मैने पूछा क्या हुआ? तो वो बोला “खुल्ले नही होने से दिक्कत हो जाती है”. ये दिक्कत शब्द बोलने का अंदाज़ मुझे बता गया की ये बिहारी हैं. मैने बैठते ही पूछा की कहाँ घर है, तो वो बोला बिहार है, मैने पूछा अबे बिहारी हो ये तो पता ही है, ज़िला बताओ, पता चला वो मेरे ज़िले का ही था. इसके बाद रिक्शे भाड़े का डिसकाउंट कूपन मुझे मिल गया, ये नौकरी की खोज वाले दिन थे तो ये ‘कूपन’ थोड़ी सहूलियत दे गया.

दिल्ली में रिक्शेवाले भी इलाके के हिसाब से कंडिशन्ड थे, मसलन दक्षिणी दिल्ली और उत्तरी दिल्ली, यूनिवर्सिटी के आस पास वाले अलग चाल-ढाल के होते थे,दक्षिण दिल्ली के रिहाइशी इलाकों में उनका भाव ज्यादा रहता था, उत्तरी दिल्ली के स्टूडेंटिया इलाको में भाड़ा किराये पे मोल मोलाई ज्यादा होता था, उत्तर पूर्वी स्टूडेंटों को टूटी फूटी हिंदी में पुरवइया रिक्शेवालों से मोल मोलाई करते देखना अपने आप में मज़ेदार अनुभव था, कभी कभी इनपे गुस्सा भी आता था, कि ससुर बालिकाओं को तो ये फ्री में भी पहुँचा दें, और हमसे 20 का 15 न लें!

फिर नौकरी और उससे आई थोड़ी समृद्धि से रिक्शेवलों से इंटेरफेस धीरे धीरे ख़त्म होता गया, पहले मोटरसायकल और फिर चार पहिया से लगभग रिक्शेवालों से बातचीत ख़त्म सी हो गयी हैं, धीरे धीरे इनकी जगह ओला/उबेर के ड्राईवरों ने ले ली हैं. उनसे शहर बाज़ार के साथ साथ देश विदेश का भी हाल चाल मिल जाता हैं, और पत्रकार लोग नया क्या सोच रहे होंगे, ये भी पहले ही पता चल जाता हैं.

बहुत सालों बाद मैं एमस्टरडम के एक प्रमुख प्रयटन स्थल पे घूम रहा था, वहां पे मैने ये फिरंगी रिक्शा वाला देखा.

यकीन मानिए इतनी खुशी, विदेशी धरती पे शायद ही कभी मिली होगी, मन किया की पूछ लूॅं “चलब: हो डैम स्क्वायर”?

Writer : @vikrantkumar

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