सोमनाथ मंदिर में प्रवेश के लिए हिंदू से इतर अन्य धर्म के लोगों को प्रवेश से पूर्व अपना नाम रजिस्टर में दर्ज कराने का प्रावधान है। राहुल गांधी का नाम उस रजिस्टर में आने ने, राजनीति में धर्म की भूमिका पर एक वृहद विवाद को जन्म दे दिया है। वामपंथी-उदारवादी पूरे दल-बल से इस तर्क के साथ कूद पड़े कि किसी भी धर्म का अनुकरण हर व्यक्ति की निजी पसंद है, चुनावों को ध्यान में रख कर ‘साम्प्रदायिक शक्तियाँ’ अनावश्यक रूप से राहुल पर आक्रमण कर रही हैं। आख़िर क्या फर्क पड़ता है इस बात से कि राहुल हिंदू है या ईसाई? परंतु राहुल गांधी को बचाने का ये तर्क ना केवल वामपंथीयों-उदारवादीयों द्वारा पूर्व में दिए गए सभी तर्कों समान ही खोखला एवं पाखंडपूर्ण था, अपितु निम्नलिखित कारणों से अत्यंत भ्रामक भी था।

प्रथम: वास्तविकता में ये राहुल गांधी ही थे जो अपने उच्चस्तरीय मंदिर भ्रमण को मीडिया के माध्यम से महिमामंडित करवा, धर्म को गुजरात चुनाव में एक अस्त्र की भाँति प्रयोग करने का प्रयास कर रहे थे। ये राहुल ही थे जिन्होंने सार्वजनिक रूप से हिंदू धर्म के त्यौहारों, मंदिरों, और रिवाजों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले कर अपना धर्म बताने का प्रयास किया था।

द्वितीय: यदि ये बात इतनी महत्वपूर्ण नहीं है तो क्यों कांग्रेस पार्टी इतनी उग्रता और बेहताशा से राहुल गांधी को सच्चा हिंदू सिद्ध करने पर तुली है? किंतु ये सिलसिला सिर्फ़ यहाँ ही नहीं रुका, कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ताओं ने ये घोषणा भी कर डाली कि राहुल ना केवल हिंदू हैं, अपितु जनेउधारी ब्राह्मण भी हैं। सम्भवतः कांग्रेस के दर्शन में ब्राह्मण से इतर अन्य किसी जाति का हिंदू होना उतना पवित्र नहीं होता। क्या राहुल गांधी को सार्वजनिक रूप से अपने धर्म की घोषणा कर इस विवाद को विराम नहीं दे देना चाहिए था? आख़िर हिंदू नहीं होने में बुराई ही क्या है? अंतत:, भारत का संविधान किसी भी व्यक्ति को किसी भी धर्म का अनुयानन करने का अधिकार देता है और निश्चित रूप से भारत के लोगों को कोई परेशानी नहीं होगी यदि राहुल अपने धर्म के बारे में खुल कर बताएँगे। अंततोगत्वा, पूर्व भारतीय राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को जनता का अथाह प्यार या पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जनता द्वारा की गयी आलोचना उनके धर्म के कारण नहीं थी, अपितु उनके किए गए अथवा ना किए गए कार्यों के कारण थी। तब ये शंका क्यों है? क्या राहुल गांधी को भारत की जनता के सैकड़ों वर्ष चले आ रहे हर धर्म के प्रति सहिष्णु रहने, उन्हें स्वीकारने के लम्बे इतिहास पर विश्वास नहीं, क्या भारत की जनता की सहिष्णुता पर राहुल के विचार सिर्फ़ नकारात्मक हैं?

तृतीय: वामपंथी-उदारवादियों (लेफ़्ट-लिबरल) का सदैव यही तर्क रहा है कि हमारे राजनैतिक प्रतिनिधियों का धर्म कोई मायने नहीं रखता; परंतु विडम्बना ये है कि कई दशकों से उन्होंने ही यह भी सिद्ध कर दिया है कि धर्म और धार्मिक प्रतिनिधित्व असल में मायने रखता है।

इसी को आगे बढ़ाते हुए वे लगातार पूछते रहे हैं कि लोकसभा में भाजपा के सांसदों में मुस्लिम प्रतिनिधित्व इतना कम क्यों है? क्या ये वही वामपंथी उदारवादी नहीं थे जिन्होंने योगी आदित्यनाथ के धर्म एवं मान्यताओं के ऊपर आक्रमण सिर्फ़ इसलिए कर दिया था क्योंकि योगी आदित्यनाथ, हमारे वामपंथी उदारवादी विवादवीरों और बतकहों के बनाए मानकों में फ़िट नहीं बैठते थे?

‘धर्म राजनीति में मायने नहीं रखता’ यदि इस तर्क को और आगे बढ़ाया जाए तो ये संकटपूर्ण और खतरनाक रूप ले सकता है। अगला क़दम ये होगा कि वामपंथी-उदारवादी पूछेंगे कि दलित और अन्य निम्न वर्ण को भी प्रतिनिधित्व क्यों दिया जाए, जाति से क्या फर्क पड़ता है? असल में जब रोहित वेमुला के दलित होने पर शंका हुई थी उन्होंने ऐसा किया भी था। एक विचित्र सा कुतर्क रखा गया था कि जाति ‘आत्म-पहचान’ मात्र होती है, ऐसा कह कर उन्होंने दलितों के उस संघर्ष का अपमान किया व उसे ओछा बनाया जिसे दलितों ने दशकों से जाति-आधारित अपवर्जन और बहिष्कार के ख़िलाफ़ लड़ा है।

चतुर्थ: ऐसा कहना भ्रामक व मूर्खतापूर्ण है कि धर्म का राजनीति से कोई लेना देना नहीं क्योंकि धर्म हर किसी का निजी मामला है। किसी व्यक्ति का विश्वास उसका निजी मामला हो सकता है परंतु धर्म एक समाजिक संरचना है, और किसी भी अन्य समाजिक ताने-बाने की तरह ही यह भी राजनैतिक है। धर्म एक मरा हुआ दमनकारी बोझ नहीं है, ना ही पूर्व-आधुनिक मानव द्वारा निर्मित समाज का तर्कहीन परिणाम है। धर्म मानवता के अस्तित्व का अटूट हिस्सा है, भले ही वैज्ञानिक आधार पर चाहे धर्म को अर्थहीन व तर्कहीन सिद्ध किया गया हो। मिथकों, किवदंतियों, विश्वास और कुछ अलौकिक व अमानवीय शक्तियों के प्रति आकर्षण ने मानव समाज के निर्माण में और उसकी स्थिरता बनाने में एक बड़ी भूमिकानिभाई है, अन्यथा धर्म मानव के अस्तित्व के समय से आज तक जीवित न रह पता और ना ही आज प्रत्येक मानव सभ्यता और समाज में पाया जाता।

पंचम: बहुत से वामपंथी-उदारवादियों ने राजनीति को अपने झूठे आदर्शों को दूसरों पर थोपने व साथ ही स्वयं सिर्फ बड़ी-बड़ी ढपोरशङ्खी बातें करने का माधयम बना लिया है। किन्तु राजनीति एक सामाजिक गतिविधि है जिसमें जाति, धर्म, क्षेत्र-विशेष, राज्य-विशेष से आने की पहचान उसके अटूट एवं अभिन्न तत्व हैं, इन्हें नाकारा नहीं जा सकता। राजनीति सदैव मानवीय जीवन के सभी पहलुओं के साथ सहभागिता करेगी व उनमें शामिल होगी, धर्म भी मानवीय जीवन के उन्हीं पहलुओं में सबसे प्रभशाली पहलू है। सभी राजनैतिक दुविधाओं के आधार में एक ही प्रश्न है, मूल्यों का प्रश्न। और किसी भी समाज का धार्मिक विश्वास उस समाज के मूल्यों पर एक शक्तिशाली प्रभाव डालता है।

उदहारण के लिए, एक मुस्लिम बाहुल्य समाज ईशनिंदा के मुद्दे को बौद्ध-बाहुल्य अथवा हिन्दू-बाहुल्य समाज की अपेक्षा बहुत अलग तरीके से देखेगा। ऐसा नहीं है कि औपचारिक रूप से चर्च और राजनीति को अलग करना असंभव है, और न ही ये सही-गलत वाला मुद्दा है, बल्कि ये तथ्य है कि धार्मिक विश्वास और राजनीति अलग-अलग नहीं हैं। इसलिए कुछ लोगों द्वारा ये तर्क दिया जाना कि किसी राजनीतिज्ञ का क्या धर्म है ये महत्वपूर्ण नहीं है, ये वास्तविक दुनिया की गलत समझ पर आधारित होता है।और ये कतई आश्चर्यजनक भी नहीं है क्योंकि वामपंथी-उदारवादी बंधुओं को दुनिया जैसी है, वैसी दिखती भी नहीं ; बल्कि जैसी उन्होंने इस दुनिया की कल्पना अपने मन में कर ली है वैसी दिखती है,और वो कल्पना भी पाखंड से भरी हुई है।

Disclaimers – This article has been translated in Hindi with permission of author (Abhinav Prakash @Abhina_Prakash) and Publisher Swarajya (@SwarajyaMag)

Translated by : @Nitishva_

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