दिल्ली मेट्रो रेल का फैला जाल राष्ट्रमंडल खेलों से दिल्ली की आधारभूत संरचना में हुए बदलावों का एक पैमाना है. इस दौरान हुए घोटालों को कोसने वालों को मैं लोकतंत्र और विकास का विरोधी मानता हूँ. अपने सतही शोध से मैने यह गूढ़ निष्कर्ष निकाला है कि लोकतंत्र घोटाला प्रधान शासन प्रणाली है एवं विकास और घोटाला रेल की दो पटरियों की तरह सदैव समानान्तर चलते हैं.दिल्ली मेट्रो रेल की मातृ संस्था भारतीय रेल है. इस पर मुझे भोजपुरी की एक कहावत याद आती है – हरही के कोख में सोरही, सोरही के कोख में हरही. भारत में जिसे देखो मुँह उठाकर विश्व स्तरीय सेवा देने का डपोरशंखी दावा ठोकने लगता है. दिल्ली मेट्रो को कभी ऐसे दावों की जरुरत नहीं पड़ी क्योंकि उसकी सेवाएं सच में विश्व स्तरीय हैं. मैं जानता हूँ कि इस वाक्य पर मेरी ट्रॉलिंग होगी; “भारत के अलावा कोई देश देखा भी है बे?.” अपनी अनेक एकदिवसीय नेपाल यात्राओं का हवाला देकर मैं ट्रॉल्स का मुँह बंद कर दूँगा.

सिर्फ बेहतर नागरिक सुविधाओं से नागरिकों में उतना ही बेहतर नागरिक भाव नहीं पैदा किया जा सकता. राजीव चौक और अन्य बड़े स्टेशनों पर यात्रियों द्वारा लाइन की धज्जियां उड़ाना और रोकने पर ‘मुंहदुबर’ सिक्योरिटी गार्ड्स से मुंहठोंठी करना इसका ज्वलंत प्रमाण है. भीड़ में उतरने-चढ़ने वाले अनेक यात्री आपको दोपाया से चौपाया होते दिख जाएंगे – दो पैरों से उतरते-चढ़ते हुए और अपने दोनों हाथ आगे वाले यात्री की पीठ पर लगाकर उसे उतरने-चढ़ने में मदद करते हुए. अवसरवादिता का जोरदार व सजीव नमूना देखना हो तो आठवें कोच की लाइन में खड़े यात्रियों में छह कोच की ट्रेन आने पर मची भगदड़ को देख लीजिए. दिल्ली ने बंगाल से सबक लेते हुए क्रांतिकारी सरकार बना ली है. कोलकाता के भद्रो मानुष से कुछ और भी तो सीखो जो माछ दूकान पर भी बिना कहे लाइन में खड़े हो जाते हैं और किसी भी जगह लाइन टूटने पर ‘लाइने दाराओ, लाइने बाहिरे जाबे ना’ कहकर जोरदार विरोध करते हैं.

मेट्रो की सीट को लोग बैकुंठ की बुकिंग जैसे भाव से देखते हैं. सीट की धक्कामुक्की में संवैधानिक संकट तब आ जाता है जब दो सीटों पर दो लोगों के बीच एक तीसरा टंग जाता है. मैं कभी सीट की मारामारी में नहीं पड़ता, हमेशा अपनी 11 नंबर की निजी पोर्टेबल कुर्सी साथ लेकर चलता हूँ. किसी जरुरतमंद के लिए किसी को सीट छोड़ते देखकर आस जगती है कि करुणा अब भी शेष है. दूसरे ही पल महिलाओं, विकलांगों या वरिष्ठ नागरिकों की सीट पर बैठे किसी सामान्य यात्री का हकदार को हक देने में आनाकानी करना बताता है कि कलयुग अपने चरम पर है. एक दिन एक भोले यात्री ने किसी से पूछा; “नवेडा (नोएडा) जाने के लिए कउन टरेन धरें?” ज्ञानी सहयात्री ने इस प्रश्न का उत्तर इस भाव से दिया गोया मेट्रो का रुट नहीं बता रहे बल्कि ब्रह्म ज्ञान दे रहे हैं.

सुबह मेट्रो से खटनी-खोली टू एंड फ्रॉम की यात्रा में जन सैलाब को देखकर यह अनुमान लगाने का मैं प्रयास करता हूँ कि इस विकसित और आधुनिक दिल्ली में लोग-बाग काम पर जाते हुए अधिक खुश या निराश हैं या घर लौटते हुए पर आज तक किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सका. अलबत्ता, मेट्रो के वातानुकूलित कोच में भी गर्मागर्म बहसें लगभग रोज देखने को मिल जाती हैं. एक दिन एक महानुभाव ने किसी को झिड़का; “धक्का क्यों दे रहे हो?” जबाब मिला; “धक्का नहीं दिया अंकल.” महानुभाव धक्के से चिढ़े थे, अंकल सुनकर पजामे से बाहर हो गये; “अंकल किसे बोला बे?” बातों ही बातों में दोनों गुत्थमगुत्था हो गये. कुछ यात्री शांत कराने का प्रयास करते रहे, अधिकांश मजे लेते रहे. तभी किसी ने मार्मिक अपील की; “आपस में मत लड़ो भाई.” भीड़ को चीरती एक दूसरी आवाज आई; “मेट्रो में आपस में ही लड़ सकते हैं, पाकिस्तान से नहीं.” यात्रा के दौरान यदि आपको राजनीतिक बहस सुनने को मिल गयी तो दिए जाने वाले तर्क-कुतर्क सुनकर आपका दिमाग यह फैसला करने से इनकार कर देगा कि आपका मनोरंजन हो रहा है या उत्पीड़न.

दिल्ली मेट्रो में स्मार्ट दिल्ली सिर्फ स्मार्ट कार्ड धारियों में ही नहीं दिखती बल्कि तब भी दिखती है जब कोई छोटा बच्चा अपने अभिभावक के साथ टिकट का पैसा बचाने के लिए एक्जिट गेट से झुककर बाहर निकल जाता है. प्यार के रंग चतुर्दिक देखे जा सकते हैं दिल्ली मेट्रो में. चप्पा-चप्पा अनगिनत प्रेम की असंख्य कहानियों का साक्षी है. सोचता हूँ कि दिल्ली मेट्रो नहीं होता तो संत वलेंटाइन सप्ताह के रोज डे, चॉकलेट डे, किस्स डे, हग डे जैसे डेज के वेन्यूज की कितनी किल्लत होती. एक दूसरे का हाथ थामकर चढ़ते-उतरते प्रेमी जोड़ों को देख बहुत अच्छा लगता है. दूसरों को होती असुविधा देखकर कभी-कभी कोफ्त भी होती है. किन्तु इन जोड़ों का भी कोई कसूर नहीं. वे ‘मेला में सईयां भुलाइल हमार …’ गाने में बताए गए अनिष्ट की किसी भी संभावना को खारिज कर देना चाहते हैं.

लोपकाचार्य के अनुसार, अब मैं एक स्थापित लेखक हूँ. लोपक.org पर मेरे दर्जन भर से अधिक लेख छप चुके हैं, प्रतिष्ठित जागरण ग्रूप के अखबार का स्तंभकार भी हूँ. ‘मंकी बैलेसिंग’ व ‘ट्विस्टिंग’ मेरा कर्तव्य व अधिकार है, शायद मजबूरी भी. व्यंग्य लिखने बैठा हूँ, दिल्ली मेट्रो की तारीफ में कसीदे पढ़ने नहीं. आप होंगे दिल्ली मेट्रो की चमकती सफाई के मुरीद, मैं नहीं हूँ. यह सफाई यात्रियों की स्वतंत्रता की कीमत पर है. न कागज फेंकने की आजादी है, न पान मसाला थूकने की. यात्री स्वतंत्रता का कोई पैरोकार जब हिम्मत करके थूकने आदि का प्रयास करता है तो सहयात्री ही उसे पमपमाने लगते हैं. भारतीय रेल को देखो. वह अपने यात्रियों जिन्हे मंत्री जी ग्राहक कहना पसंद करते हैं, को कितनी स्वतंत्रता देता है.

रोज लाखों फूट-प्रिंट पड़ते हैं राजीव चौक जैसे स्टेशन पर किन्तु रात साढ़े दस के बाद जाएं तो ऐसा लगता है कि कोई आया ही नहीं था. ये भी कोई बात हुई. बगल में भारतीय रेल के नई दिल्ली या पुरानी दिल्ली स्टेशनों पर जाइए, ऐसा खालीपन नहीं दिखेगा क्योंकि भारतीय रेल अपने यात्रियों/ ग्राहकों से प्यार करता है और उनकी छोड़ी गयी गंदगी को भी निशानी समझकर जल्दी नहीं मिटाता.

दिल्ली मेट्रो की समय पर चलने की आदत हम खटिकों के लिए परेशानी का सबब है. खटनी पर देर से पहुँचने पर मेट्रो के विलंब होने का बहाना हम अपने सेठ से बना ही नहीं सकते. भारतीय रेल ऐसी कोई पाबन्दी अपने यात्रियों/ ग्राहकों पर नहीं लगाता कि समय पर ही पहुँचो. उल्टा समय पर पहुँचे यात्रियों को डिमोटिवेट करने के लिए वह अपनी उद्घोषणाओं से उसे चिढ़ाता है कि फलां जगह जाने वाली ढ़िमकान गाड़ी इतने घंटे विलंब से चल रही है.

जब मैं किसी पड़ोसी देश के नागरिक को दिल्ली मेट्रो को आश्चर्य की निगाह से देखते हुए देखता हूँ तो मेरा भारतीय स्वाभिमान कुलांचे मारने लगता है. दिल्ली से बाहर के किसी भारतीय का मेट्रो में चकित चेहरा देखकर स्वयं के दिल्लीवासी ‘इंडियन’ होने पर गर्व होता है. साथ ही मैं भगवान से यह कामना करता हूँ कि शेष भारत में भी विकास के ऐसे टापू थोक में दिखें.

लेखक -: राकेश रंजन (@rranjan501)
चित्र :- सुरेश (@sureaish)

1 COMMENT

  1. हर मेट्रो यात्री के अनुभव का सजीव चित्रण, पर लिखना सबके बस की बात नहीं. संतुलित लेख, व्यंग्य के लिए जरूरी नहीं कि केवल नकारात्मक हास्य का सहारा लिया जाए. मेट्रो संचालन के बाद लखनऊ के यात्रियों की स्वच्छंदता की भी परीक्षा होगी. महिमामंडित तेजस जैसा चीरहरण मेट्रो का भी न हो जाए.

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