भारत एक चुनाव प्रधान देश है. एक चुनाव जाता नहीं कि दूसरा आ धमकता है. जल्दी-जल्दी चुनाव होने के अनेक फायदे हैं. इससे लोकतंत्र में जड़ता नहीं आती. मतदाता खुद को अधिक दिनों तक ठगा हुआ महसूस नहीं करते और अगली जगह का चुनाव आते ही वहाँ के मतदाताओं से वैसा कुछ कर गुजरने की अपेक्षा करने लगते हैं जो वे अपने यहाँ के चुनाव में लोकतंत्रोचित कारणों से नहीं कर सके. मनोरंजन के शौकीन लोग बिग बॉस जैसे टी शो को मिस्स नहीं करते. झंडा, बैनर, टेन्ट और नारा उद्योग में मन्दी नहीं आती. पत्रकारों को बकरबाजी का एक और बहाना मिल जाता है. सेफोलॉजिस्ट्स के अंदाजीफिकेशन का कौशल कुन्द नहीं होता.

आते-जाते चुनावों के इसी क्रम में दिल्ली के एमसीडी चुनावों की डुगडुगी बज चुकी है. डंका की जगह डुगडुगी शब्द के प्रयोग पर हैरत मत कीजिए. यूपी विधान सभा चुनावों का डंका बजा था. उस लिहाज से दिल्ली के एमसीडी चुनावों में डुगडुगी बजना भी कायदे से अतिशयोक्ति ही है. हर चुनाव की तरह इस बार भी इस प्रश्न का उत्तर शायद ही मिले कि चुनाव किन मुद्दों पर लड़ा जा रहा है. मुद्दे साफ हों या न हों पर मतदाताओं की सुविधा के लिए यह स्पष्ट अवश्य है कि चुनाव लड़ने वाले कौन हैं और हास-परिहास का स्तर क्या होगा. लोकतांत्रिक हास-परिहास पर नजर रखने वाले अधिकतर टीकाकारों का मानना है कि झाड़ू दल के उदय के बाद दिल्ली का इस मामले में पूरे देश में कोई सानी नहीं बचा.

खबर है कि बिहार के महागठबंधन के चंगू-मंगू भी एमसीडी चुनाव लड़ेंगे. अपना फलूदा फैलाने का हक सबकी तरह इनको भी है. परिपक्व राजनीति करते हुए बिहार के चिराग दल ने अपने वरिष्ठ सहयोगी पार्टी का समर्थन करने की घोषणा टशन के साथ कर दी है. यह बात अलग है कि बिहार तक में इनका चिराग जलना दूसरों की बाती और तेल पर निर्भर करता है. यूपी वाली बुआ जी की पार्टी भी चुनाव लड़ ही रही है पर परिणाम पहले से पता है. एक नयी पार्टी आयी है. भरम मत रखिए, ताजगी कतई नहीं है. जी हाँ, सलीम उर्फ मिसरी यादव की खुन्नस पार्टी. लोग इसे वोटकटवा पार्टी मान रहे हैं किन्तु पार्टी के अधिवक्ता श्रेष्ठ को वोटकटवा पार्टी की उपाधि रास नहीं आयी और उन्होने रोमियो के लिए कृष्ण का उपहास करके वोट काटने की संभावना को खत्म करने का हरसंभव प्रयास किया है.

देश की सबसे पुरानी (बेशक वंशवादी भी) पार्टी के जज्बे को सलाम ठोकने को जी करता है. पार्टी और अपने सर्वोच्च नेता की इतनी भद्द पिटने के बाद भी पार्टी की दिल्ली इकाई के मुखिया इवेंट मैनेज्ड कैंपेन करने का हौंसला दिखा रहे हैं. वह हिट ‘चाय पर चर्चा’ एवं ‘पर्चा पर चर्चा’ की नकल करते हुए तथा ‘खाट पर चर्चा’ का हश्र भुलाकर ‘नाले की चाट पर चर्चा’ कर रहें हैं. उधर किसी ने पार्टी पर टिकट बेचने का आरोप भी लगा दिया. लोग इस खबर पर क्रुद्ध नहीं हुए बल्कि चकित रह गये और उन बाजीगर टैप खरीददारों का नाम जानने को उतावले होने लगे. यह दल हार से निराश नहीं होगा. जीत उन्हे आश्चर्यचकित अवश्य करेगी.

भारतीय राजनीति में बची खुची शुचिता को बुहार फेंकने का माद्दा रखने वाली झाड़ू पार्टी एमसीडी चुनावों में लोगों से झाड़ू चलाने की अपील कर रही है. हालांकि पार्टी का बस चले तो इन चुनावों से पहले वह तीन इंटरनल चुनाव करा ले, इन चुनावों के फिक्स्ड परिणामों होंगे : 1 – जेठू दद्दू की फीस दिल्ली सरकार भर दे 2- शुंगलू पैनल पर सरकार को क्लीन चिट. 3- 12000/ के लंच का आरोप झूठा. पार्टी बिजली-पानी बिल हाफ की कथित उपलब्धि और प्रॉपर्टी टैक्स साफ के नहीं पूरा होने वाले वादे पर चुनाव लड़ रही है. लोगों को उनकी बिजली-पानी बिल की महाबचत पर आसन्न खतरे से आगाह कर रही है. मुहल्ला क्लिनिक से आयी स्वास्थ्य क्रांति एवं सरकारी विदयालयों के आमूल-चूल परिवर्तन से हुई शिक्षा क्रांति का ढ़िढ़ोरा भी पीटा जा रहा है. ये क्रांतियां अभी धरातल पर शायद  नहीं पहुँची पर ट्विटर और अन्य सोशल मीडिया पर स्पष्टत: दृष्टिगोचर हैं. पार्टी अपने ‘एंटरटेनमेन्ट सह इरीटेटिंग एसेट्स’ को चुनाव प्रचार में झोंक चुकी है जो अपने करतबों से यथास्थिति की राजनीति को क्रांति की राजनीति से बेहतर दिखा रहे हैं. साथ ही पार्टी ‘सब मिले हुए हैं जी’ का अपना पुराना जुमला अपने दो प्रमुख प्रतिद्वंदियों पर टांक रही है. बस आश्चर्य सिर्फ एक बात का कि झाड़ू पार्टी ने अब तक 272 में 269 सीटें जीतने वाला अपना इंटरनल सर्वे परिणाम सार्वजनिक नहीं किया. ये परिणाम जब तक आते नहीं जब तक यह माना जाएगा कि पार्टी का आत्मविश्वास डगमगाया हुआ है. अन्ना द्वारा झाड़ू दलाधिपति को सिद्धांतहीन बताने पर विरोधी अधिक रोमांचित न हों. लोग-बाग जानते हैं कि अन्ना कितने बड़े नीति-निधान हैं और सैद्धांतिक राजनीति की कितनी जगह देश में शेष है. वैसे यह पार्टी हर स्थिति का सामना करने को पहले से तैयार है, जीती तो एमसीडी का जुबानी जमा खर्च में कायाकल्प कर देगी और हारी तो ठीकरा ईवीएम पर फोड़ देगी.

दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल (थैंक्स टू मिस्ड कॉल मेंबरशिप) के कट्टर समर्थक मानने लगे हैं कि दल भारत में लोकतांत्रिक अश्वमेघ यज्ञ कर रहा है. कई तो एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं; “फार्मूला राजनीति कर रहे विरोधियों के विजित होने का यही क्रम जारी रहा तो भारतीय लोकतंत्र विपक्षहीन एक दलीय प्रणाली की ओर प्रवृत होता दिखता है.” एमसीडी चुनावों में पार्टी के आत्मविश्वास से लबरेज होने का कारण शायद यही है. हालांकि इतिहास साक्षी है कि इससे भी मजबूत हवा फुस्स होती रही है. बहरहाल, पार्टी ने अपने सभी पुराने पार्षदों के टिकट काट दिये हैं. एमसीडी चुनावों में सारे नये चेहरे लाना आत्मविश्वास का परिचायक है या एमसीडी में पार्टी के प्रदर्शन पर भरोसे की कमी का प्रतीक, यह कहना थोड़ा कठिन है. पार्टी के स्थानीय अध्यक्ष कलाकार हैं ही नहीं बल्कि राजनीति करते हुए भी कलाकारी कर रहे हैं. पता नहीं इस कलाकारी से परिणाम प्रभावित होंगे या नहीं. दर्जन भर से अधिक केन्द्रीय मंत्री चुनाव प्रचार करने वाले हैं. मीडिया में आज के सबसे चर्चित राजनेता योगी जी भी आएंगे ही. बताये गये सारे नामों का चुनाव प्रचार भी दल को चुनाव जिताने के लिए ‘मोदी नाम केवलम’ के बिना नाकाफी है. पार्टी अपनी जीत के लिए एमसीडी के अपने काम पर नहीं बल्कि बल्कि अपने सर्वोच्च नेता के नाम पर निर्भर है. समझ नहीं आता कि यह दल का सबसे मजबूत पक्ष है या सबसे कमजोर. इन सारी बातों के मद्देनजर पार्टी के समर्थक बल्ले-बल्ले करते दिख रहे हैं. वैसे चुनावों में पार्टी के फींके प्रदर्शन की सूरत में समर्थकों के पास इसे पार्टी का ‘मास्टर स्ट्रोक’ बता देने का विकल्प भी सुरक्षित है.

इन सब बातों से परे मतदाता अपने महिमामंडन के दिनों को जी भरकर जियें और एमसीडी चुनावों में जमकर मतदान करें.

लेखक – राकेश रंजन (@rranjan501)
रेखाचित्र – सुरेश रंकावत (@sureaish)

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