प्रिय सैनिक बंधुओ,

मेरी मित्र शिवांगिनी नें ट्विटर पर एक पोस्ट में टैग करके जब कहा की हमें कारगिल में तैनात सैनिको के लिए चिट्ठी लिखनी चाहिए तो मैं सहर्ष तैयार हो गया, ख़त ले जाने का ज़िम्मा नेहा और दीक्षा द्विवेदी बहनो ने लिया है, दोनो बहने बहुत साहसी हैं, इनके पिता मेजर द्विवेदी, कारगिल शहीदों में से एक हैं, ये दोनो गोद में होंगे जब उन्होने देश पे अपने प्राण न्योछावर कर दिए, बहुत मुश्किल समय देखा होगा इन्होने.

ये ख़त जब लिखने बैठा तो दिमाग़ मे अचानक से संज्ञाशून्य हो गया, क्या लिखूं उनके लिए जिनके लिए कोई भी उपमा अलंकार कम हैं, क्या ऐसा लिखा जाए जो अब तक उन सैनिकों ने नही पढ़ा और सुना होगा?

देश का हर व्यक्ति अपने हिसाब से देश के लिए काम करता हैं, खिलाड़ी देश के लिए मेडल लाते हैं, तो कलाकार देश की कला और संस्कृति को देश के बाहर फैल कर देश की प्रतिष्ठा बढ़ाते हैं, हम जैसे काम काज़ी लोग देश के वर्तमान व भविष्य के ज़रूरतों के लिए टैक्स भरते हैं, सब का अपना छोटा मोटा योगदान हैं, सैनिक देश के लिए सबसे श्रेष्ठ त्याग – जीवन बलिदान तक देता हैं, ये बात सैनिको को बाकी देश वासीयो से भिन्न करती है.

आप लोग वहाँ जिन चुनौती भारी परिस्तिथियों में देश की रक्षा करते हैं, ये बात जब भी ध्यान में आता हैं, तो सिर अपने आप झुक जाता हैं. मैं खुद एक सैनिक का बेटा हूँ, सैनिको के खुद के जीवन में क्या क्या चुनौतिया आती हैं, ये मैंने खुद देखा हैं. सरकार हर संभव कोशिश करती हैं की सैनिको को जितनी हो सके मदद दी जाए, तब भी कई कमियां रह जाती होगी और भी ज़रूरतें हैं देश की, शायद आपको कुछ परेशानियां भी झेलनी पड़ती हो, फिर भी इससे आपके देश के लिए मर मिटने की प्रेरणा में कभी कोई कमी नही देखी गई, न ही इससे आपके निष्ठा और साहस पे कभी किसी को शक़ होता हैं, ये आपके व हम सब सैनिक परिवारों के लिए गौरव की बात है.

बाकी क्या लिखूं, शब्द कम पड़ते हैं, तो बस अमूल्य मिश्रा जी की कलम से “सैनिक की मां का खत” की कुछ पंक्तियां लिखूंगा –

काल हो जो सामने तो रूप को विक्राल कर।
दुश्मनों की वह धरा न हो रक्त से विहीन।
शत्रुओं के ख़ून से तू उस धरा को लाल कर
जीत कर जो आया तो फिर दूध से नहलाऊंगी।
और अपने हाथ से हलवा पूरी खिलाऊंगी।
जो तू लिपट आया तिरंगे, गर्व से भर जाऊंगी।
मातृ भू का ऋण चुकाने छोटे को भिजवाऊंगी।

आप सब सैनिक भाइयों का फिर से एक बार बहुत बहुत आभार.

विक्रांत कुमार
नोएडा (UP)

नोट: ये उस वास्तविक चिट्ठी की प्रतिलिपि है, जो लेखक @vikrantkumar ने दीक्षा/नेहा द्विवेदी को भेजी है, ताकि वो इसे अपने #LettersToKargil में शामिल कर सकें!

1 COMMENT

  1. कुछ बात है… कुछ तो बात है ज़रूर … के हस्ती मिटती नहीं हमारी ।।
    वो बात इन्हीं सपूतों की है। इस मातृभूमि की पैदावार ही ऐसी है, जहां जियाले पैदा होते है।।
    जो जहां है, वो वहीं पूरी ताक़त से खड़ा रहे बस।।
    इस देश को वापस वो गौरव दिला के रहेंगे।।
    जय हिन्द।।
    जय हिन्द की सेना।।

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