विश्व शांति के चतुर्दिक महिमामंडन के बीच विश्व बिरादरी युद्धवादियों व युद्धप्रेमियों की कराह भी सुने. दूसरा विश्वयुद्ध हुए दशकों बीत गये हैं. पूरी दुनिया को दो फाड़ करता हुआ बोरिंग शीतयुद्ध वर्षों चला. वे एक ग्रीष्म युद्ध भी कर लेते तो उनका क्या बिगड़ जाता, इस युद्धिष्ट समाज का थोड़ा भला तो हो जाता. वो तो भला हो उन देशों का जिन्होने शांति के उब भरे पत्थर पर छोटे मोटे युद्ध के दूब उगाए और युद्धवादियों का भरोसा इस दुनिया में कायम रखा. ट्रंप और किंग जोंग ने पिछले कुछ समय से माहौल बनाकर आस जगायी थी पर अंत में वे भी गले मिल गए. यह बात अलग है कि शीतयुद्ध के समय से ही यह इतिहास रहा है कि शिखर वार्ता की प्रक्रिया वार्ताकारों की वैसी प्रत्यास्थता (Elasticity) है जिसकी समाप्ति के बाद दोनों वार्ताकार अपनी पूर्व अवस्था (हेंकड़ी भी पढ़ सकते हैं) में लौट जाते हैं.

हमारे देश में ढंग का अंतिम युद्ध 1971 में हुआ था. कारगिल का युद्ध भी कोई युद्ध था भला. लिहाजा हमारे युद्धवादी विचलित हैं. हालांकि जोरदार आर्थिक और तकनीकी तरक्की के बीच मनोरंजन के साधनों की भरमार है पर उब भी तो कोई चीज होती है. टीवी, फिल्में और इंटरनेट आदि से परे कुछ नया और धमाकेदार चाहिए, वॉर फिल्मों से दिल को कब तक बहलाया जाए. भरे पूरे लोगों के लिए युद्ध देशभक्ति की रुमानियत से भरा मनोरंजन है. आए दिन सीमा पर होने वाले टंटों से उनमे नयी आस जगती है और फिर टूट जाती है. युद्धवादी अपने युद्धप्रेमी अनुवाईयों के साथ मन से भी तेज गति के साथ हर उस स्थान पर विचरते रहते हैं जहाँ युद्ध की थोड़ी भी संभावना दिखे. डोकलाम में तो इनका लंबा डेरा डालने का इरादा था लेकिन इनके घरवाले हमेशा सतर्क रहते हैं कि कहीं ये मौका पाकर निहत्थे ही सीमा की ओर मल्लयुद्ध के लिए कूच न कर जाएं.

देश के युद्धवादियों ने टीवी चैनल्स से सांठगांठ करके ट्रंप-किंग जोंग पर कैसे कैसे सपने बेचे थे. चैनल्स ने तो ग्राफिक्स के जरिये अवश्यम्भावी परमाणु युद्ध/ विश्वयुद्ध ठीक वैसे ही दिखा दिया था जैसे श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध से पहले महाभारत दिखाया था. लेकिन ये भी टांय टांय फिस्स निकले. ट्रंप और किंग जोंग के मधुर मिलन से देश में युद्धप्रेमियों के उतने दिल टूट गये जितने टॉप की किसी सुन्दर अभिनेत्री के विवाह के बाद भी नहीं टूटते. इस दिन युद्धवादियों ने अपने युद्धप्रेमी अनुवाईयों के साथ शोक में ड्राई डे मनाया था. निराश युद्धप्रेमी युद्धवादियों से खीझ भरे सवाल कर रहे हैं; “अब कब और कहाँ होगा युद्ध?” निरुत्तर युद्धवादी कई बार यह सोचने को बाध्य हो जाते हैं कि लोकतंत्र से बेहतर तो राजतंत्र ही था जहाँ न सिर्फ युद्ध खूब होता था बल्कि राजा स्वयं भी तलवार भांजकर प्रजा की रक्षा भी करता थे और मनोरंजन भी.

हारने के लिए कुख्यात सेना प्रधान देश पाकिस्तान से युद्ध पर हमारे देश में उत्साह का आलम यह है कि जब प्रेम और देशभक्ति का कॉकटेल पीकर सन्नी पा जी ने पाकिस्तान में हैंडपंप उखाड़ा तो हमारी बांछे खिल गयी थी. भारत ने पाकिस्तान को 1948, 1965 और 1971 में तीन बार हराया. कारगिल का युद्ध मिनी युद्ध था, इसीलिए भारत की यह जीत 3.5 वीं जीत थी. सन्नी पा जी ने स्कोर भारत: 3.75 और पाकिस्तान: 0 कर दिया. लेकिन हमारे युद्धवादियों को इतने से संतोष नहीं है. बाग्लादेश तोड़कर भी ये खुश नहीं, युद्ध के पराक्रमी पाना से पाकिस्तान का पुर्जा पुर्जा खोल देना चाहते हैं. धरती के स्वर्ग का आधा कैसे ले लें, पूरा लेकर ही दम लेंगे. इसके लिए वे सरकार से आर-पार की लड़ाई चाहते हैं. इस पर तकाजे और तकरार के बीच युद्ध का दूर दूर तक कोई नामोनिशान नहीं.

युद्ध नहीं हो रहे तो युद्धवादी अपनी प्रतिभा जाया तो नहीं करेंगे. इसलिए वे रक्षा विशेषज्ञ बनकर युद्धप्रेमियों का ज्ञानवर्द्धन कर रहे हैं और युद्धवाद का प्रसार. हमारे इर्द गिर्द थोक में ऐसे विशेषज्ञ घूम रहे हैं जो ब्रह्म चेलानी को अपना चेला रमानी बनाने की क्षमता रखते हैं. वे दो देशों की सैन्य शक्ति ऐसे तौलते हैं जैसे उनके पास कोई तिलिस्मी तराजू हो. कम ही लोग जानते हैं कि नेताजी ने चीन का परमाणु बम पाकिस्तान में गड़े होने का सनसनीखेज रहस्योद्घाटन ऐसे ही किसी रक्षा विशेषज्ञ की शोध को उड़ाकर किया था जिससे देश का अहित होते होते बचा और नेताजी की खूब वाहवाही हुई. चर्चाएं तो यह भी थीं कि एक दूसरे विशेषज्ञ ने सर्जिकल स्ट्राइक करके चीन के इन परमाणु बमों को उखाड़ लाने की योजना भी बना ली थी.

अपने युद्धवादी युद्धू अध्ययन में पेंटागन के शोधपत्र तक पढ़ते हैं और सेल्फफन के बोधपत्र भी. वे अपने षडयंत्र सिद्धांत भी गढ़ते रहते हैं. ऐसे ही एक सिद्धांत के तहत एक स्वनामधन्य ‘प्रधान’ विशेषज्ञ ने दाउद इब्राहिम के मौत की 90 प्रतिशत पुष्टि कर दी थी, 10 प्रतिशत जमीनी हकीकत के लिए शेष रखा था जो आज भी शेष ही है. युद्ध की संभावना खोजने के लिए ये चैनल-चैनल, वेबसाइट-वेबसाइट, ब्लॉग-ब्लॉग और ट्विटर-फेसबुक तक कहाँ नहीं भटकते. एक नजर क्रिकेट पर भी रखते हैं ताकि यदि भारत-पाकिस्तान क्रिकेट मैच की संभावना बने तो उनके लिए ‘ना से भला कुछ’ हो जाए. एक खबर आयी कि भारत के पास दस दिन ही लड़ने का गोला बारुद है. युद्धवादी युद्धू निराश होकर यह बात युद्धप्रेमी बुद्धू को बताने गए तो बुद्धू ने नहले पर दहला जड़ दिया; “दस दिन का ही युद्ध करा लो.” युद्धू बगले झांकने लगे.

पाँच साल पर एक युद्ध तो होना ही चाहिए और हो सके तो चुनावों से पहले ताकि उनका भी काम बन जाए, युद्धवादियों की लाज व युद्धप्रेमियों का मन भी रह जाए और खाली बैठे बोर हो रहे ‘अमन की आशा’ वाले भी काम पर लग जाएं. लेकिन कई युद्धू अपने बुद्धूओं के साथ युद्ध होने की स्थति में सीमा पर जाकर लाइव युद्ध देखने की जिद्द लिए बैठे हैं. उनका क्या होगा, जरा सोचिए.

लेखक – राकेश रंजन (@rranjan501)
रेखाचित्र – सुरेश रंकावत (@sureaish )

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