जुमले भी साकार होते है । बस उन्हे देखने वाली नजर होनी चाहिए । मेरी नजर तेज है । इस उम्र में भी मुझे चश्मे की जरुरत नहीं पड़ी और न ही किसी चक्षु चिकित्सक की । ‘इस उम्र’ की सप्रसंग व्याख्या के लिए आप किसी लोपकी से संपर्क साध सकते हैं क्योंकि यह भेद मैं यहाँ इस आलेख में खोलने लगा तो मूल मुद्दे से भटक जाउँगा ।

बहुत ही पुराना जुमला है ‘जियो और जीने दो’ । हम इसका कितना पालन करते हैं, आप सबको पता है । आज हम सब स्वयं ‘जिय़ो’ के फेरे में हैं, ‘जीने दो’ का काम हमने टीम भावना के तहत सामने वाले पर छोड़ रखा है । मुकेश अंबानी ज्यादा खुश न हों क्योंकि लोग जियो के चक्कर में तो हैं पर जी नहीं पा रहे या आप जीने (जियो सिम) नहीं दे रहे । फिर भी एक दिन मुझे ‘जियो और जीने दो’ का जुमला साकार होता दिख ही गया ।

बड़ा ही मनोहारी दृश्य था जब वैसे दो कवि प्रेम पूर्वक मिले जिन्हे कवि सिर्फ वही दोनों समझते थे और वह भी परस्पर कवि की मान्यता पाने के लिए । इसे इन कवियों के स्तर पर टिप्पणी न समझा जाए क्योंकि कवि के रुप में मशहूर होने की आवश्यक शर्त नहीं है स्तरीय होना । दृश्य में मनोहर सिर्फ भाव ही था क्योंकि कवियों के मिलन की जगह स्वच्छ भारत को मुँह चिढ़ाता हुआ पटना का मीठापुर बस पड़ाव था और दोनों कवियों का औसत रुप लावण्य भी अखिल भारतीय औसत से दो या तीन पायदान नीचे था । दोनों के बीच परनामा-पाती हुई और बिना किसी भूमिका के दोनों ने आँखों ही में आँखों में ‘जियो और जीने दो’ की स्पिरिट के साथ ‘सुनो और सुनाने दो’ का द्विपक्षीय समझौता कर लिया ।

समझौते आसानी से हो जाते हैं पर असली परेशानी होती है उनके कार्यान्वयन में । सत्तर के दशक का शिमला समझौता, अस्सी के दशक का पंजाब समझौता, असम समझौता, मिजोरम समझौता और न जाने कितने अकथित व अनाम समझौते होने को तो हो गये पर इनका कार्यान्वयन हुआ या नहीं हुआ, हुआ तो कितना हुआ और कौन सी बाधाएं आईं, यह सब इतिहास है । समाजवादी पार्टी के हालिया कलह पर समझौता होने की खबर है पर झंझट कराने वाले, समझौता कराने वाले, दोनों पक्ष और मजे लेते तमाशबीन (मीडिया, जनता व गैर सपा दल) सब जानते हैं कि आगे कितनी दुश्वारियाँ आनी हैं । जब इन सत्ता संसाधन संपन्नों का समझौता कार्यान्वयन कठिन होता है तो बेचारे इन दोनों निरीह और नॉन-सेलेब कवियों की क्या बिसात ।

कवि सम्मेलन आयोजन की पहली बाधा थी बस पड़ाव में दोनों के बैठने की किसी जगह का अभाव अर्थात मंच बनाने की समस्या । बिहार के विकास पुरुष ने स्पष्ट व सख्त आदेश दे रखा है कि मीठापुर बस पड़ाव में कोई बेंच या कुर्सी न लगाई जाए वरना फालतू कविगण और बतोलेबाज इनपर बैठकर काव्य पाठ या बकैती से अनुत्पादकता को बढ़ावा देंगे । आस पास के अति स्वच्छ एवं शुद्ध (सिर्फ बाहर लगे बोर्ड के अनुसार ही) वेज/नॉन-वेज ढाबे विकल्प हो सकते थे पर कवियों का पुरानी परम्परा का कवि होने के कारण उनका अक्षुण्ण कड़कापन आड़े आ रहा था । किन्तु दोनों धुन के पक्के थे । अपने एजेंडा को मूर्त रुप देने के लिए गपियाते हुए पटना जंक्शन के किरबिगहिया छोर पर पहुँच गये । हमारे कमजोर इच्छाशक्ति वाले नेताओं को कविद्वय से सबक लेना चाहिए ।

पटना जंक्शन के किरबिगहिया छोर पर टिकट खिड़की के सामने खाली जगह है जो रात में रेल यात्रियों के सोने के काम आती है । दिन में भी कुछ आराम-पसन्द यात्री यहाँ लोट-पोट करते पाए जाते हैं । यहाँ सुरक्षा को कोई खतरा नहीं । इससे आप यह न समझिए कि रेल पुलिस बहुत कर्मठ हो गयी है । दरअसल वहाँ २४*७ सुरक्षा सेवा कुत्ते मुहैया कराते हैं, कुत्तों से स्वयं की रक्षा की जिम्मेदारी यात्रियों पर है । इसी जगह को दोनों कवियों ने अपने काव्य पाठ के लिए चुन लिया । एक मद्धिम सी आस भी थी कि शायद टिकट लेने वाले यात्रियों में से दो चार श्रोता भी मिल जाएं । इसी आशा में साफ दिखते रेलवे फर्श पर कविद्वय पालथी मारकर बैठ गये । सुधि पाठकों में यदि कोई आरटी पिपाषु ट्विटकार हों तो पिछला वाक्य ट्वीट कर दें । रेल मंत्री उसे सात तालों व सात पर्दों से भी ढ़ूँढ़कर आरटी कर देंगे ।

दूसरी समस्या यह थी कि ‘कविता पहले पढ़ेगा कौन या पहले सुनेगा और चटेगा कौन’ पर निर्णय । टॉस से इसका हल निकाल लिया गया और पहले कवि ने काव्य पाठ शुरु कर किया । ल़ोग कविता पाठ होते देखकर रास्ता काटकर इधर उधर से ऐसे निकलने लगे गोया कविता से संक्रमण का खतरा हो । बेपरवाह कवि जी ने काव्य पाठ जारी रखा ।

बेढ़ंग बेडौल मैं कटहल सा
तुम गोल मटोल अनार प्रिय
जामून हूँ मैं कसेला सा
तुम हो लीची रसदार प्रिय

दूसरे कवि ने वाह वाह की झड़ी लगा दी, सुरक्षा देते कुत्तों ने भाउँ भाउँ की । कवि जी पढ़ते रहे, दूसरे वाह वाह करते रहे । वाह वाह करने की भी एक सीमा होती है । उसके आगे भी कुछ कहना होता है । वाह वाह करते हुए श्रोता कवि सोचते रहे कि इसे श्रृंगार की श्रेष्ठततम रचना बताएं या कवि को पर्यावरणवादी कवि कह दें या फलों की पौष्टिकता के लिए इसे स्वास्थ्यवर्द्धक कविता करार दें । फैसला नहीं कर सके तो सिर्फ वाह वाह ही करते रहे । अभिभूत वक्ता कवि ने अपना काव्य पाठ तालियों के बीच समाप्त किया । बताना जरुरी नहीं कि तालियां बजाने वाले चार हाथों में दो स्वयं इनके थे ।

ताली बजाकर, वाह वाह करके और अपनी बारी की प्रतीक्षा करके थके दूसरे कवि की बारी आयी तो वह पालथी लगाए ही बल्लियों उछलने लगे । अपनी रचनाओं से नहीं बल्कि बायो से खुद को व्यंग्यकार बताने वाले युग में हैं हम और हमारा साहित्य । दूसरे कवि जी  व्यंग्यकार और कवि के कॉकटेल निकले । भोजपुरी कवित्त से व्यंग्य कसना आरम्भ किया ।

नेता बारन लउकत
चमचा बारन फउँकत
भोटर बारन छउकत
चुनाव आ गईल का हो

‘श्रोता भी कभी वक्ता था’ का ध्यान रखते हुए और अपने काव्य पाठ पर हुई प्रशंसा का मान रखते हुए श्रोता कवि ने बाह बाह का अंबार लगा दिया । वाह वाह की जगह बाह बाह कहना भोजपुरी का सांकेतिक सम्मान था क्योंकि भोजपुरी का सम्मान या तो न के बराबर होता है या होता है तो सिर्फ सांकेतिक । चार हाथों की तालियों के बीच ही दूसरे कवि का भी कविता पाठ समाप्त हुआ ।

‘जियो और जीने दो’ को साकार करने का दूसरा दौर भी चलता लेकिन तभी कवियों की नजर बहुत देर से उन्हे घूर रहे रेल पुलिस जवान पर पड़ गयी । सुबह से चाय न पी सके कविद्वय चाय-पानी मांगे जाने की आशंका से घबरा गए । कविता पाठ हो चुका था और लिफाफा अदायगी की कोई रस्म थी ही नहीं । इसलिए आँखों के इशारे से कवि सम्मेलन समाप्त कर दिया गया । कैब बुकिंग का टंटा नहीं था और न ही ऑटो हायरिंग का झमेला । अगला सम्मेलन वृहद करने के निश्चय और साहित्य साधना की संतुष्टि के साथ कविद्वय अपनी ११११ नंबर की साझी पोर्टेबल सवारी पर निकल पड़े ।

लेखक – राकेश रंजन (@rranjan501)
रेखाचित्र – सुरेश रंकावत (@sureaish)

2 COMMENTS

  1. शनिवार की सुबह हल्की-फुल्की करने के लिए धन्यवाद। कवि तो एक भी मिल जाए तो माहौल बना देता है। यहां तो 2 मिल गए – वो भी पटना में!

  2. लगा इस कविद्वय की सभा में उपस्थित हूं. आपकी शुद्ध हिंदी की मै प्रशंसक हूं. अगले आलेख की प्रतीक्षा रहेगी.

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