शत्रु सेना और इस महायोद्धा के बीच एक चौड़ी दलदली पाट थी। शत्रु को लगा कि हाथी पर बैठा यह महायोद्धा इस दलदल को पार न कर सकेगा। यदि इसने प्रयास किया तो हाथी दलदल में फंस जाएगा। किन्तु ये क्या! महायोद्धा क्षण भर में अपने सैन्यबल के साथ दलदल के उस पार था। लेकिन अंगरक्षक पीछे छूट गए। अब जीत और इस महायोद्धा के बीच कुछ ही दूरी रह गई थी। क्या भारत के दुर्भाग्य की काली अंधेरी रात समाप्त होने वाली थी? नहीं, सहसा सब कुछ बदल गया। एक तीर इस महायोद्धा के आँख में लग गया। एक तीर, एक अदद तीर ने भारत के इतिहास को बदल कर रख दिया।

यह महायोद्धा थे महाराजाधिराज सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य। युद्ध का मैदान था पानीपत। वर्ष था विक्रम संवत 1613, 5 नवम्बर, 1556। ये कहानी हेमू बक्काल के सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य बनने की कहानी है।

हेमू का जन्म वर्ष 1500 में अलवर, राजस्थान में हुआ था। इनका परिवार एक सामान्य आर्थिक स्थिति वाला परिवार था। बाद में हेमू के पिता हरियाणा के रेवाड़ी में आकर बस गए जहाँ वे लोग नमक का व्यापार करते थे। बड़े होकर हेमू भी इस व्यापार में शामिल हो गए। हेमू में व्यापार सम्बन्धी सूझबूझ बहुत अधिक थी। बड़ी तेजी से उन्होंने अपना व्यापार बढ़ाया और अब वे शेरशाह सूरी की शाही सेना के साथ नमक का व्यापार करने लगे।

शेरशाह सूरी के बाद उसका पुत्र इस्लाम शाह दिल्ली का सुल्तान बना। उसके शाही खजाने की हालत बेहद खराब थी। सैनिकों को वेतन देना कठिन हो गया था। राज्य का वित्तीय प्रबंधन पूरी तरह बिगड़ चुका था। इस्लाम शाह पहले से ही हेमू को जानता था व इनकी योग्यता से बहुत प्रभावित था। उसने हेमू को अपना वित्तमंत्री नियुक्त किया। हेमू ने अपनी योग्यता से एक ही वर्ष में ही इस्लाम शाह की वित्तीय स्थिति में बहुत सुधार किया। हेमू के प्रयास से मुसलमानी शासनकाल में पहली बार सैनिकों को नगद वेतन देने की परंपरा शुरू हुई। इस्लामशाह सूरी की सेना को साप्ताहिक नगद वेतन दिया जाने लगा जो सम्भवतः विश्व का सबसे ऊँचा सैन्य वेतनमान था। यह परिवर्तन हेमू के कारण ही आया था। इसीलिए सेना में हेमू की लोकप्रियता आसमान छूने लगी। लेकिन दस वर्षों के शासन के बाद ही इस्लाम शाह की मृत्यु हो गई। इस्लाम शाह के बाद उसके पुत्र की हत्या करके शेरशाह सूरी का भतीजा आदिलशाह बादशाह बन बैठा। अय्याश आदिलशाह के वश में शासन न था। उसने हेमू को और अधिक शक्ति दे दी लेकिन युद्धक्षेत्र से दूर ही रखा।

यह समय भारतीय उपमहाद्वीप में भारी उथल पुथल का दौड़ था। इस्लाम शाह के बाद अफगानों में एकता नहीं थी। मौका देखकर हुमायूं ने भारत पर हमला कर दिया। सरहिंद में अफ़ग़ान सेना पराजित हुई और आदिलशाह को दिल्ली छोड़ना पड़ा। हेमू इस हार से बेहद दुखी थे। वे भारत को मुग़लों के हाथ मे नही जाने देना चाहते थे। रेवाड़ी में युवावस्था में उन्होंने मुग़लों के अत्याचार को देखा था। उन्होंने आदिलशाह को सरहिंद से दिल्ली के रास्ते मे ही मुग़लों पर हमला करने की सलाह दी। लेकिन आदिलशाह में इच्छाशक्ति का अभाव था। हेमू को यह समझ मे आ गया कि भारत भूमि की रक्षा को अफ़ग़ान अपना दायित्व नही समझते। उनके लिए भारत भूमि बस भोग की भूमि थी। उन्हें कर से मतलब था। प्रजा रक्षण की अधिकारिणी है, यह भाव अफगानों में कतई न था। हेमू ने निश्चित किया कि अब भारत मे हिन्दू राज स्थापित करने का समय आ गया है। हिंदुओं का अपना राज ही पश्चिमोत्तर से आने वाले आततायियों से प्रजा की रक्षा कर सकेगा। इसी दिन से हेमू ने अपनी योजना पर कार्य करना आरम्भ कर दिया।

हुमायूं ने दिल्ली तो जीत लिया था लेकिन देश के बड़े हिस्से, विशेष कर पूर्वी भारत पर आज भी अफगानों का शासन था। सूरी वंश में कोई योग्य शासक नही रह गया था लेकिन एक बड़ा कोष और एक सेना थी। सेना को युद्ध का अनुभव था लेकिन वह नेतृत्व के अभाव में बिखर रही थी। ऐसी विकट परिस्थितियों में आदिलशाह ने हेमू को सेनाध्यक्ष बनाया। सेना से यह हेमू का पहला सीधा साक्षात्कार था। इस समय हेमू 50 वर्ष से अधिक वय के थे। सेना में सीधे उनका प्रवेश सेनापति के रूप में हुआ। हेमू एक प्रशिक्षित सैनिक नही थे। सेनापति बनने से पहले तक हेमू को घुड़सवारी भी नही आती थी। शाही सेना हेमू का बहुत सम्मान करती थी लेकिन उनके सैन्य सूझबूझ पर सेना में सन्देह था। । अफगानों के अंदर भी कई गुट बन गए थे जो एक दूसरे को काटने के लिए बेचैन थे। लेकिन हेमू चुनौतियों से पार पाना जानते थे। उन्होंने एक-एक कर सभी अफगान गुटों को पराजित किया। देश के पूर्वी हिस्से जो लगभग पूर्वी उत्तरप्रदेश तक था, पर आदिल शाह का शासन हेमू ने स्थापित कर दिया।

हेमू के सामने भविष्य की योजना स्पष्ट थी। ऐसे में वे सिर्फ पठानों की सेना के भरोसे नही रहना चाहते थे। सेनापति बनने के बाद हेमू ने अफ़ग़ान सेना में हिंदुओं की भारी संख्या में नियुक्ति आरम्भ की। नियुक्त होने वाले मुख्यतः बिहार और उत्तरप्रदेश के भूमिहार-ब्राह्मण और राजपूत थे। इस समय हेमू का केंद्र पूर्वी भारत ही रहा। हेमू अब तक 20 से अधिक युद्ध जीत चुके थे और उनकी एक अजेय सेनापति के रूप में प्रतिष्ठा कायम हो गई थी। इसका लोहा शत्रु और मित्र सभी मानने लगे थे।

अकबर का दरबारी अबुल फजल लिखता है कि हेमू महान व्यक्तित्व के स्वामी थे। उस समय वैसा कोई भी राजा पूरे विश्व मे न था। वे मितभाषी थे। मित्र बनाने की कला में निपुण थे। मित्र तो मित्र, शत्रु भी उनका आदर करते थे। हेमू सेना की आवश्यकताओं को सबसे ऊपर रखते थे। उनकी सेना उन पर जान छिड़कती थी। धन मांगने वाले कभी उनके द्वार से खाली न जाता था। इसके बाद भी अहंकार उन्हें छू तक न सका था।

त्रिपुंड धारण कर अपने प्रिय हाथी ‘हवाई’ पर बैठ कर हेमू जब युद्धभूमि में प्रवेश करते थे तो उनकी सेना का मनोबल आकाश को छूता था वहीं शत्रु की सेना में हाहाकार मच जाता था। मुग़ल सेना में हेमू का भय बहुत गहरे घर कर गया था। लेकिन हेमू इस सब से संतुष्ट नहीं थे। उनकी एक आँख हमेशा दिल्ली पर ही रहती थी। इसी समय आदिल शाह के दरबार मे हुमायूं के मृत्यु की खबर पहुँचती है। हेमू सलाह देते हैं कि यह सही समय है जब दिल्ली पर हमला कर मुग़लों को उखाड़ फेंका जाए। लेकिन आदिलशाह में युध्द के लिए साहस का अभाव था। वह इनकार कर देता है। लेकिन हेमू अपना निर्णय नहीं बदलते हैं और दिल्ली की ओर कूच करते हैं।

हेमू की सेना में सौ से अधिक तोपें, 1000 से अधिक हाथी व 50,000 से अधिक घुड़सवार सैनिक थे। जिसमें बिहार और उत्तरप्रदेश के भूमिहार-ब्राह्मण और राजपूत सैनिक भारी संख्या में थे। इनके बाद अफ़ग़ान सैनिकों की संख्या थी। सम्भल में हेमू की सेना का पहला टक्कर मुग़लों से होता है। कुछ घण्टे के युद्ध मे ही मुगल गवर्नर अली कुली खान सम्भल से भाग गया। सम्भल की विजय के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लड़ाका जातियाँ जो वर्षों से मुस्लिम राज के अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष कर रही थीं, जिनमे जाट, यादव और गुर्जर मुख्य थे, हेमू की सेना का हिस्सा बन गई। इससे हेमू की सेना का आत्मविश्वास और बढ़ गया। ग्वालियर में मुग़लों को पराजित करते हुए हेमू आगरा की ओर बढ़े। अब तक हेमू का खौफ इतना अधिक बढ़ चुका था कि आगरा का मुगल सूबेदार बिना लड़े ही दिल्ली भाग गया। अब अगला मुकाबला दिल्ली में ही होगा यह तय हो गया।

दिल्ली में मुग़लों का सेनापति तरदी बेग था। तरदी बेग अपने समय का एक जाना माना लड़ाका था जो अपनी क्रूरता के लिए कुख्यात था। उसने हरियाणा, दिल्ली और आस-पास की हिन्दू जनता पर बहुत जुल्म ढाये थे। वह मुग़लों के सबसे बेहतरीन सेनापतियों में से एक था जो कभी कोई युद्ध नहीं हारा था और इसी कारण उसे दिल्ली का गवर्नर बनाया गया था।

7 अक्तूबर, 1556 को कुतुबमीनार के पास हेमू और मुगलों की सेना में युद्ध आरम्भ हुआ जिसे तुगलकाबाद की लड़ाई भी कहते हैं। मुग़लों के पास विशाल सेना थी और उनके घुड़सवार उस समय मे दुनिया के सबसे शानदार घुड़सवार माने जाते थे। घोड़ा आगे बढ़ाते हुए वे पीछे घूमकर शत्रु सेना पर सटीक निशाना लगाकर तीर बरसा सकते थे। यह कला तब किसी और सेना के पास नहीं थी। पहला हमला मुग़लों की तरफ से हुआ। तरदी बेग खुद अपनी सेना के बीच मे था। उसके दांए और बांए की टुकड़ी ने बहुत जबरदस्त हमला किया। हेमू अपनी सेना से कुछ पीछे अपने हाथी पर एक रिजर्व दस्ते के साथ तैयार थे। हेमू के 3000 सैनिक काट दिए गए। हेमू ने अपनी सेना को पीछे हटने का आदेश दे दिया। एक समय को लगा कि मुगल जीत जाएंगे। लेकिन नही, यह तो हेमू की रणनीति थी। दरअसल हेमू बांयी और दांयी टुकड़ी से लड़ना ही नही चाहते थे। उनका निशाना ही तरदी बेग था। तो जब दांयी और बांयी टुकड़ी बहुत आगे हेमू के कैम्प में आ गई और युद्ध को जीता हुआ मानकर लूट-खसोट में लग गई। तभी युद्ध के मैदान से कुछ दूर खड़े हेमू ने अपनी टुकड़ी के साथ तरदी बेग पर जबरदस्त हमला किया। कुछ ही मिनटों में हेमू की सेना ने मुगल सेना को तहस-नहस कर दिया। तरदी की बड़ी सेना पहले ही बहुत आगे निकल गई थी। हमला इतना जोरदार था कि मुग़लों को सोचने का मौका ही न मिला। इस हमले को तरदी बेग झेल न सका और हाथी छोड़ घोड़े पर बैठ वह युद्ध के मैदान से भाग निकला। सेनापति को भागते देख मुग़लों में हड़कंप मच गया। हेमू की बड़ी विजय हुई और आततायी मुग़ल सैनिक भारी संख्या में काट दिए गए।

हेमू ने अपनी शक्ति और सूझबूझ से सम्भल, ग्वालियर, आगरा और दिल्ली छीना था। इसके बाद हेमू दिल्ली के सिंहासन पर हेमचन्द्र विक्रमादित्य के नाम से एक सम्प्रभु सम्राट के रूप में आरूढ़ हुए। 400 वर्षों बाद दिल्ली के सिंहासन पर हिन्दू राजा आसीन हुए। इस समय हेमू का राज्य बंगाल से लेकर सतलज तक फैला हुआ था।

दिल्ली हारने के बाद तरदी बेग के भागने से मुगल सेना में हेमचन्द्र विक्रमादित्य का डर बहुत अंदर तक बैठ गया। सामान्य सैनिक ही नही मुगल सरदारों में भी खौफ भर गया। जिसने तरदी बेग जैसे सेनापति को भागने पर विवश कर दिया हो, उसे पराजित करने की सोचने का साहस भी मुग़लों में बचा न था। लेकिन बैरम खान हार मानने को तैयार न था। उसने पंजाब से दिल्ली की ओर कूच किया। हेमचन्द्र विक्रमादित्य ने भी दिल्ली में जश्न मनाना उचित न समझा और उनकी सेना भी आगे बढ़ी। इस तरह दोनों सेनाएं पहुँचीं उसी जगह पर जहाँ 30 साल पहले मुग़लों के लिए हिंदुस्तान का दरवाजा खुला था और वो जगह थी पानीपत का मैदान। इसी मैदान में एकबार फिर भारत के भविष्य का निर्णय होना था।

जहाँ मुगल सेना में हेमू की सेना का जबरदस्त खौफ था वहीं हेमू की सेना अपराजित थी। 22 युद्ध जीत चुकी थी। उसमें आत्मविश्वास कूट कूटकर भरा था। लेकिन हेमू के साथ एक दूसरी ही समस्या उत्तपन्न हुई। पानीपत के रास्ते मे हेमू ने स्वप्न देखा कि उनका एक प्रिय हाथी बाढ़ में डूब गया है और वे खुद भी डूबने ही वाले थे कि उनके गले मे जंजीर डालकर मुग़ल सिपाहियों ने बाहर निकाला। सुबह हेमू इसका अर्थ जब अपने पुरोहित से पूछा तो पुरोहित ने चिंतित स्वर में कहा; “इसका अर्थ है पराजय और मृत्यु”। लेकिन हेमू ने उत्तर दिया; “होगा इसके विपरीत”! अगले दिन भयंकर बारिश हुई। नवम्बर के महीने में हरियाणा में सामान्यत: बारिश होती नहीं। इस बारिश में बिजली गिरने से हेमू का प्रिय हाथी, जिसे स्वप्न में डूबते देखा था और जो उनके 22 युद्धों का साथी था, मृत्यु को प्राप्त हुआ। लेकिन हेमू विचलित न हुए। अगली सुबह भारत के भाग्य का निर्णय होना था। विचलित होने का अवसर वीरों के पास होता भी कहाँ है।

5 नवम्बर, 1556 को पानीपत के मैदान में पहला हमला हेमू की सेना ने किया। भीषण युद्ध आरम्भ हुआ। पहले घण्टे में मुग़ल सैनिक भारी संख्या में मारे गए। हेमू बड़े आत्मविश्वास से अपने हाथी ‘हवाई’ पर बैठकर युद्ध का संचालन कर रहे थे। उनके दांए में अफ़ग़ान सेनापति शादीलाल कक्कर नेतृत्व कर रहा था तो बांयी ओर हेमू का भांजा रमैया था। घनघोर युद्ध हुआ। खानवा की लड़ाई के बाद ऐसा युद्ध भारत मे नही हुआ था। हेमू की ओर से सेनापति शादीलाल कक्कर और सेनापति भगवान दास युद्ध मे मारे गये जबकि मुग़लों की पूरी अग्रिम पंक्ति काट दी गई थी। अब पूरा नेतृत्व हेमू के हाथों में था। हेमू ने फिर दिल्ली की रणनीति अपनाई। मुग़लों की दांयी और बांयी टुकड़ी को छोड़कर केंद्रीय टुकड़ी पर हमला बोला।

हमला इतना जोरदार था कि मुग़ल सेना के पैर उखड़ गए। विजय सुनिश्चित जान पड़ता था। मुग़लों की पराजय स्पष्ट हो चुकी थी। लेकिन हेमू का अंगरक्षक दस्ता पीछे छूट चुका था। मुग़लों का एक निपुण तीरंदाज हाथियों के पीछे से लगातार हेमू पर हमले कर रहा था। एक तीर हेमू की बांयी आँख में लग गई, रक्त बहने लगा। हेमू मूर्छित हुए और उनका महावत यह सोचकर कि युद्ध चलता रहेगा, हेमू को सुरक्षित जगह पहुँचाया जाए, युद्ध के मैदान से निकलने लगा। लेकिन सेना ने समझा कि हेमू की मृत्यु हो गई। अब तक हेमू का भांजा रमैया भी वीरगति को प्राप्त हो चुका था। कोई सेनापति मैदान में न रहा, सेना में भगदड़ मच गई। जीता हुआ युद्ध क्षण भर में पराजय में बदल गया। मुग़लों ने हेमू को गिरफ्तार कर लिया और दरबार मे बैरम खान एवं अकबर के सामने पेश किया जहाँ बैरम खान ने हेमू को मुग़लों की अधीनता स्वीकार करने को कहा। न मानने पर उस महान योद्धा का सर धर से अलग कर दिया।

मुग़लों ने हेमू की सेना के हिंदुओं का सर काटकर उसकी एक मीनार खड़ी की। जिसके बाद अकबर गाजी कहलाया। बैरम खान ने हरियाणा, विशेषकर रेवाड़ी में भीषण कत्लेआम किया। हेमू के पिता को इस्लाम स्वीकार न करने पर मौत के घाट उतार दिया गया। जबकि हेमू की पत्नी और पुत्री को उनके अंगरक्षकों ने सुरक्षित राजस्थान पहुँचा दिया। कुछ वर्षों बाद हज को जा रहे बैरम खान को मारकर अफगानों ने अपने प्रिय सेनापति हेमू की हत्या का बदला ले लिया।

भारत के महान इतिहास में हेमू मेघविद्युत की तरह आये और चले गए। उनका शासन मात्र 29 दिनों का था। 50 वर्ष की उम्र में सेनापति बनकर, उन्होंने 22 युद्ध लड़े और जीते, जब हारे भी तो शत्रु से नही, अपने भाग्य से हारे। लेकिन हिन्दू राज्य का महत्व उन्होंने रेखांकित किया जिससे आने वाली पीढ़ियाँ प्रेरणा प्राप्त कर स्वराज के लिए लड़ती रहीं। भारत के इतिहास में हेमू ‘फुटनोट’ का हिस्सा हैं जबकि गाजी अकबर की तथाकथित महानता ऐसा ‘हेडर’ बना हुआ है जो इतिहास के पाठकों को फुटनोट तक जाने नहीं देता । क्या इतिहास की पुस्तकें इस महान योद्धा और दिल्ली के अंतिम हिन्दू शासक से न्याय करेंगी? यदि हाँ तो कब, आखिर कब?

लेखक : मुकुल मिश्र @MukulKMishra
चित्र : सुरेश रांकावत @SureAish

1 COMMENT

  1. बहुतै सुंदर मतलब बहुतै सुंदर लिखे हैं मिश्रा जी!!

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