पिछले कई दिनों से जीवन कोहरा प्रधान हो गया है. चारों तरफ कोहरा ही कोहरा है. इधर कोहरा, उधर कोहरा. आसमान में कोहरा जमीन पर कोहरा. सड़क पर कोहरा. पगडंडी में कोहरा. मैदान में कोहरा पेड़ पर कोहरा. राजनीति पर कोहरा, अर्थनीति पर कोहरा। फैमिली वार पर कोहरा, खेवनहार पर कोहरा. अर्थव्यवस्था पर कोहरा, कानून-व्यवस्था पर कोहरा. कोहरे के ऊपर कोहरा और कोहरे के नीचे कोहरा.
कोहरा-काल चल रहा है जी.

जीवन में कोहरे का महत्व बढ़ गया है. हालत यह हैं कि आज नोटबंदी के बाद जो सबसे महत्वपूर्ण चीज है वह है कोहरा। जिसे देखो वह कोहरे की बात कर रहा है. जो बात नहीं कर रहा वो कोहरे को निहारने में व्यस्त है.

माँ ने रसोई से आवाज़ लगाईं; “बाजार जाकर मटर ला देते”

पुत्र ने कहा; “कैसे जाऊं? कोहरा पड़ा है. विजिबिलिटी ज़ीरो है. मटर की जगह गलती से बीन्स चली आई तो?”

जिन पुत्रों को सर्दी में बाहर नहीं जाना उनका काम कोहरे ने आसान कर दिया है.

रामधनी जी ड्राइवर को ड्यूटी पर आठ बजे पहुँचना है और वे नौ बजे तक नहीं पहुंचे। बॉस ने फ़ोन करवाया तो जवाब मिला; “सर, बड़ी कोहरा है. आज गाड़ी निकालना सही नै रहेगा”

बॉस ने कहा; “ऑफिस जाना है”

रामधनी बोले; “सर ढेर कोहरा पड़ा है. आ गाड़ी ले के निकले भी त एतना कम लौक रहा है कि कोई ठोंका न जाए. ऊपर से कोई ठोंका गया त पबलिक हमरा गाड़ी नंबर भी नोट नै कर सकेगा”

जिनके इलाके में कोहरा पड़ा है वे मौज में हैं. जिनके इलाके में नहीं है वे बेचारे निराश होते हुए कह रहे हैं कि; “कितने लकी हैं वे लोग जिनके इलाके में कोहरा पड़ा है. एक हम हैं जो कोहरे के लिए तरस गए हैं.”

जो कोहरे की वजह से आफिस देर से पहुँच रहे हैं वे यह सोचकर धन्य हुए जा रहे हैं कि उनका जीवन कोहरे से प्रभावित है. उनके पास कल तक जितनी कहानियां थीं उसमें कोहरे की कहानी और जुड़ गई. वे इस बात से मन ही मन प्रमुदित च किलकित हैं कि कोहरे की इस कहानी को अपने नाती-पोतों को सुना सकेंगे.

आज से बीस-पचीस साल बाद जब कभी कोहरा पड़ेगा तो वे कहेंगे; “अब कहाँ पड़ता है कोहरा? ये कोहरा भी कोई कोहरा है? कोहरा तो पड़ा था जनवरी २०१७ में. हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. खाने बैठे थे. रोटी के साथ सब्जी की जगह अचार उठा लिया और मुंह की जगह नाक में डाल लिया. ऐसा कोहरा पड़ा था उस साल. ये कोहरा तो उस कोहरे के सामने बुतरू है.”

मुझे पूरा विश्वास है कि ऐसे लोग उन लोगों को हेयदृष्टि से देखते होंगे जिनके इलाके में कोहरा नहीं पड़ रहा है.

टीवी न्यूज़ चैनल पर तो हालात बहुत खराब हो गए हैं. संवाददाता बेचारे कोहरे को कवर करते हलकान हुए जा रहे हैं. कोई रेलवे स्टेशन पर कोहरा कवर कर रहा है तो कोई हवाई अड्डे पर. संवाददाता कैमरे के सामने खड़े होकर स्टूडियो में बैठी सोनिया देवी से कह रहा है; “आप देख सकती हैं सोनिया कि विजिबिलिटी जीरो है.”

उधर टीवी स्टूडियो में बैठी सोनिया देवी चाहकर भी नहीं पूछ पा रही हैं कि; “सौरभ, विजिबिलिटी अगर जीरो है तो तुम कैसे दिखाई दे रहे हो?”

रेलगाड़ियाँ लेट चल रही हैं. हवाई जहाज लेट उड़ रहे हैं. कुछ कैंसल हो जा रहे हैं. लेट चलते-चलते रेलगाड़ियाँ बोर हो जा रही हैं तो आपस में भिड़ जा रही हैं. रेल विभाग पर कोहरे की मार बहुत जोर से पड़ी है. अधिकारियों को घर से भी काम करना पड़ रहा है. जो नहीं कर पा रहे हैं वे भी काम कर रहे हैं.

रेलयात्री निरंजन कुमार गाड़ी में बैठे-बैठे फोन लगाकर घरवालों को तीस घंटे देर से पहुँचने की सूचना दे रहे हैं. उनसे चिर नाखुश घरवाले यह सोचकर खुश हैं कि उनके बबुआ की गाड़ी केवल तीस घंटे लेट चल रही है जबकि शर्मा जी के बेटे ने फोन करके बताया कि उसकी गाडी चौंतीस घंटे लेट चल रही हैं. आज पहली बार शर्मा जी का बेटा उनके बेटे से किसी बात में पीछे हो गया.

कुल मिलाकर विकट कोहरामय जीवन है.

कोहरे से हो रहे क्षति का हिसाब लगाया जा रहा है. न जाने कितने लोग कैलकुलेटर पर अंगुलियाँ फेरते बिजी हैं. एयरलाइंस की फ्लाईट कैंसल हो गई? आज कुल पचास करोड़ का नुकशान हुआ. कैंसिलेशन के वजह से पेट्रोल-डीजल नहीं बिका सो अलग. सबकुछ जोड़ लें तो कुल मिलाकर सुबह से ग्यारह बजे तक सत्तावन करोड़ चौबीस लाख का नुक्सान हो चुका है. नेताजी को छत्तीसगढ़ जाकर छात्रों से मिलना था. फ्लाईट कैंसल होने की वजह से वे नहीं जा सके. छात्र उनका इंतज़ार करके अपने-अपने घर चले गए. कुल ढाई सौ छात्रों ने अगर चार घंटा इंतज़ार किया तो कुल मिलाकर १००० छात्र घंटे का नुक्सान हो गया. उधर नेताजी का सात घंटे का नुक्सान अलग.

महीने भर बाद इसी कोहरे के बीच ही बसंत आ जायेगा. बसंत को सर्दी से डर नहीं लगाता इसलिए आ जायेगा। सर्दी उसके आने से वैसे ही खफा होगी जैसे रोज रात को साढ़े नौ बजे सोनेवाले किसी नियम के स्ट्रिक्ट आदमी के घर में अचानक कोई बिना बताये आ जाए. लेकिन सर्दी भी इतनी जल्दी हार मानने वाली थोड़े न है. सत्ता हस्तांतरण इतना ईजी नहीं होने देना चाहती. बसंत के आने से सर्दी इस कदर गुस्सा होगी कि वो कोहरे के साथ हाथ मिलाकर गठबंधन करेगी और कोहरे को लाकर बसंत बाबू के सामने खड़ा कर देगी। लो झेलो अब. हमें नहीं समझते न. अब इससे निपटो. बसंत की गाड़ी पटरी से उतर जायेगी।

ऐसे में कोहरा केवल बसंत को ही नहीं बल्कि साथ-साथ कुलवंत, यशवंत और हनुमंत को भी हलकान करेगा।

कल तक बसंत पर कविता लिखने वाले कवि अब कोहरे पर कविता लिखना शुरू कर देंगे। कविताओं में उपमा अलंकार बहेगा। कोई कवि आसमान को कोहरे की मोटी चादर में लपेट देगा तो कोई अपनी गाड़ी को कोहरे के कम्बल में लपेट कर सुला देगा। कोई तो समय को ही कोहरे में लिपटा बता देगा। विकट कविताई करवायेगा ये कोहरा. कविताई का वातावरण ऐसा चौचक बनेगा कि वीररस का कवि बसंत और कोहरे के युद्ध का वर्णन करते हुए कविता लिख सकता है.

लेकिन ऐसा नहीं है कि कोहरे की वजह से केवल और केवल नुक्सान ही हो रहा है. अगर कोहरे के बीच दिमाग से काम लिया जाय तो कुछ लोगों के लिए कोहरा वरदान भी साबित हो सकता है. शर्त केवल एक ही है वे कोहरे का सही इस्तेमाल करें. कल को कांग्रेस के प्रवक्ता से कोई प्रश्न कर सकता है; “पंजाब में सीटें डिसाइड नहीं हुई. यूपी में गठबंधन डिसाइड नहीं हुआ. राहुल जी के देश में नहीं रहने से सब ठप है. वे वापस क्यों नहीं आते?”

प्रवक्ता कह सकता है; “वे तो पिछले दस दिनों से आने के लिए तैयार हैं लेकिन कोहरे की वजह से आ नहीं पा रहे”

कोई अगर अमर सिंह जी से पूछे कि; “लग तो रहा था कि झगड़ा सलट गया था. फिर से क्यों बिगाड़ हुआ?”

अमर सिंह कह सकते हैं; “सब ठीक हो गया था लेकिन कोहरे की वजह से फिर गड़बड़ हो गया. विजिबिलिटी इतनी कम थी कि माननीय नेताजी ने शिवपाल सिंह जी को रामगोपाल जी समझ कर उनसे बात कर ली”

खैर जो भी हो, कुल मिलाकर यही कहना है कि भैया सर्दी के मौसम में कोहरा, ओस वगैरह तो रहेगा ही. इतना हलकान होने की क्या ज़रुरत है? वैसे भी ग्लोबल वार्मिंग की बात सच साबित हुई तो कुछ ही सालों में कोहरा और ओस तो केवल म्यूजियम में रखने की चीजें हो जायेंगी. इसलिए जब तक कोहरा वगैरह के दर्शन हो रहे हैं करते जाइए. मस्त रहिये.

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पेशे से अर्थ सलाहकार. विचारों में स्वतंत्रता और विविधता के पक्षधर. कविता – हिन्दी और उर्दू – में रुचि. दिनकर और परसाई जी के भीषण प्रशंसक. अंग्रेजी और हिन्दी में अश्लीलता के अतिरिक्त सब पढ़ लेते हैं – चाहे सरल हो या बोझिल.

2 COMMENTS

  1. कोहरा को हर प्रसंग से जोड़ कर बहुत बढ़िया लिखा है..बुतरू.. नै.. ठोंका जाएगा.. जैसे शब्द की मिठास को भी सहेजना ज़रूरी है.. नहीं तो सवैया..अढैया.. के पहाड़े की तरह लुप्त हो जाएगा..

  2. कोहरा है न बड़कऊ … विजिबिलिटी जीरो है.. उस पार कोई साफ देख ही नहीं सकता.. जो जितना देख पाता है, क्षमतानुसार, उतना बताता है… हमने दो साल से कोहरा नहीं देखा, अपने गांव से दूर है ना.. कोहरे के उस पार बस गांव ही दिखता है।।
    कभी तप्ते के पास बैठा हुआ … कभी गरम चाय का स्टील ग्लास अपनी लोई से दोनों हाथों में समेटे चौपाल में ठहाका लगाता हुआ।।
    विजिबिलिटी जीरो है ना बड़कऊ… सब धुंधला ही दिखता है।।

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