किस काल में कौन सी चीज समाज का दर्पण हो, यह उस काल के समाज पर निर्भर करता है। प्राइमरी या मिडिल स्कूल के विद्यार्थी के लिए पहले साहित्य समाज का दर्पण होता था। अब नहीं है। साहित्यकार, आलोचक और प्रकाशक की तिकड़ी की भूमिका ने रहने नहीं दिया। बाद में एक तरफ सिनेमा वालों ने दर्पण दिया तो दूसरी तरफ राजनीति वालों ने भी दिया। वैसे और माध्यम भी पीछे नहीं रहे।

इतिहास देखें तो यह काम हिंदी सिनेमा के गानों ने दशकों से अपने हाथ में ले रखा था. वे हर एक-दो महीनों में समाज को दर्पण थमाते रहते हैं। समाज इन गानों में अपनी छवि देखकर मस्त रहता है। आज से ६०-७० वर्ष बाद अगर कोई शोध करने वाला इस विषय पर शोध करेगा तो बड़ी तन्मयता के साथ हर काल के गानों को आगे रखकर सिद्ध कर देगा कि उस काल का समाज कैसा था।

प्रेम में दिल के महत्व जैसे विषय पर काम करने वाले शोधार्थी के पास गानों की कमी कभी नहीं रहेगी।

जैसे नब्बे के दशक के गाने; “धीरे-धीरे आप मेरे दिल के मेहमां हो गए, पहले जान, फिर जान-ए-जान, फिर जान-ए-जाना हो गए” की चीर-फाड़ करते हुए शोधार्थी लिखेगा; “इस गीत के बोल से साबित होता है कि इस काल का नायक अपनी नायिका को एकदम से दिल का मेहमां नहीं बनने देता था। वह इस काम को धीरे-धीरे करने में विश्वास रखता था। वह पहले नायिका को जान बनाता था, फिर जान-ए-जान और बहुत ठोंक-पीट कर ही जान-ए-जाना बनने देता था। इस काल के नायक का विश्वास ‘लउ’ एट फर्स्ट साइट में नहीं था। इस गीत से यह प्रमाण भी मिलता है कि प्रेम की तमाम पदवी में नायिका के लिए जान-ए-जाना सबसे महत्वपूर्ण पदवी होती थी। कुछ समाजशास्त्रियों का मानना है कि इस काल का नायक चूंकि ज्यादातर नौकरीशुदा होता था इसलिए वह कंपनियों के एच आर डिपार्टमेंट द्वारा प्रतिपादित तरक्की के सिद्धांतों में विश्वास रखता था। कुछ एच आर एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर इस गाने के बोल को एक नौकरीशुदा इंसान के नौकरी में लगने से लेकर उसके प्रमोशन से तुलना की जाय तो जान की तुलना अप्वाइंटमेंट, जान-ए-जान होने की तुलना नौकरी के परमानेंट होने और जान-ए-जाना होने की तुलना असिस्टेंट मैनेजर बनने से की जा सकती है।

अपने इस सिद्धांत को सही ठहराने के लिए शोधार्थी उसी काल के एक और गीत; “आँखों में बसे हो तुम, तुम्हें दिल में बसा लूंगा ….” का भी सहारा ले सकता है। वह लिख सकता है; “इस गीत से इसे गाने वाले नायक के भी नौकरीशुदा होने के प्रमाण मिलते हैं। इस गीत में नायक अपनी नायिका को सूचना देते हुए बता रहा है कि नायिका फिलहाल आँखों में ही बसी है और दिल में बसने के लिए उसका प्रमोशन होना ज़रूरी है। कि नायक की कंपनी की एच आर पॉलिसी के अनुसार नायिका का आँखों में बसने का अर्थ है उसे अभी केवल अप्वाइंटमेंट लेटर मिला है और कुछ महीनों बाद जब उसका अप्रेजल होगा और तब अगर नायक संतुष्ट हुआ तभी वह नायिका को दिल में बसने देगा।”

नायक और नायिका के गुणों में अंतर बताते समय शोधार्थी यह भी साबित कर सकता है कि नायिका चूंकि नौकरीशुदा कम ही होती थी इसलिए वह नायक को फट से दिल में बसा लेती थी। अपनी इस थ्योरी के समर्थन में वह “दिल में तुझे बसा के, कर लूंगी मैं बंद आँखें …” जैसे गीत का सहारा ले कर बता सकता है कि नायक ज्यादातर प्रेम में घुटे हुए रहते थे लिहाजा जहाँ नायिका अपने नायक को फट से दिल में बसाकर आँखें बंद कर लेती थी, वहीँ नायक पहले नायिका को आँखों में बसाता था और पूरी तरह से देखने परखने के बाद ही दिल में बसने देता था। नायक का यह स्वभाव उनदिनों उसके प्रेम में सावधानी बरतने की बात को पुख्ता करता है।

प्रेम में लिप्त नायक के जीवन में दिल का क्या महत्व रहता था इसबात पर प्रकाश डालते हुए शोधार्थी लिख सकता है; “प्रेम में गिरे नायक के दिल में एक झरोखा भी रहता था जिसमें वह यदाकदा नायिका को बिठाता था। प्रसिद्द गीत दिल के झरोखे में तुझको बिठाकर यादों को तेरी मैं दुल्हन बनाकर रखूँगा मैं दिल के पास ….गीत से यह प्रमाण मिलता है कि प्रेम में असफल नायक जब सत्य को स्वीकार कर लेता था तब वह नायिका को अपने दिल से निकाल कर दिल के इसी झरोखे में बिठा देता था और नायिका को दुल्हन न बना पाने की स्थिति में उसकी यादों को ही दुल्हन बनाकर संतुष्ट हो लेता था। संतोषगति प्राप्त नायक के पास और कोई चारा नहीं होता था इसलिए वह नायिका को सूचना देते हुए बताता था कि नायिका को उदास होने की ज़रुरत नहीं है क्योंकि वह दुल्हन न बन सकी तो क्या हुआ, उसकी यादें तो नायक की दुल्हन बन ही सकती हैं।”

प्रेम में दिल के महत्व को समझाते हुए शोधार्थी लिख सकता है कि ; “दिल का हाल सुने दिलवाला …” नामक गीत से इसबात का प्रमाण मिलता है कि उनदिनों हर दिल का कोई न कोई हाल होता था जिसको कोई दूसरा दिलवाला ही सुनता था। अगर कोई किसी के दिल का हाल नहीं सुनता तो यह साबित हो जाता था कि हाल सुनाने वाले के पास तो दिल है लेकिन उसे न सुनने वाले के पास दिल नहीं है। वह आगे लिख सकता है; “हालांकि, इसबात का रिकॉर्ड नहीं मिलता कि बिना दिलवाले जिन्दा कैसे रहते थे? किसी वैज्ञानिक ने इसबात पर रिसर्च नहीं किया कि दिल का हाल न सुनने वाले दिलहीन इंसानों के शरीर में खून की आवाजाही कैसे होती थी?”

एक प्रश्न कि ; “जीवन में दिल ज्यादा महत्वपूर्ण है या जान?” पर शोधार्थी लिख सकता है; “तमाम गीतों की चीरफाड़ करने पर यह पता चला है कि प्रेम-प्रसंग में जान दिल से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। महान गीत ‘दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये ..‘ से यही बात साबित होती है कि उनदिनों जान की कीमत दिल से ज्यादा होती थी। हाँ, यह मानना पड़ेगा कि जान दिल से भले ही कीमती होती थी लेकिन प्रेम में पागल नायिका वह भी देने के लिए तैयार रहती थी और उसके के लिए भी उसकी बहुत छोटी सी शर्त रहती थी। शर्त यह कि नायक बस एक बार उसका कहा मान ले तो नायिका को जान देने से गुरेज नहीं थी. इससे इस बात के प्रमाण भी मिलते हैं कि नायक लोग नायिकाओं का कहा बड़ी मुश्किल से मानते थे। नब्बे के दशक के एक और गीत ‘दिल क्या चीज़ है जानम अपनी जान तेरे नाम करता है ..’ से भी यह बात साबित होती है कि प्रेम में लिप्त नायक भी जान के आगे दिल को कुछ नहीं समझता था और अपनी जान नायिका के नाम करने के लिए तत्पर रहता था। एक और गीत दिल, नज़र, जिगर क्या है, मैं तो तेरे लिए जान भी दे दूँ …गीत से भी इस बात की पुष्टि होती है कि जान केवल दिल से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं थी बल्कि नज़र और जिगर से भी ज्यादा महत्वपूर्ण होती थी और श्रेष्ठ प्रेम में जान देने को भी सबसे ऊंचा दर्जा दिया गया था.

नब्बे के दशक के ही एक और गीत ‘मुझे नींद न आये मुझे चैन न आये, कोई जाए जरा ढूंढ के लाये न जाने कहाँ दिल खो गया को आगे रखकर शोधार्थी लिख सकता है; “इस गीत से नायक-नायिका के यदाकदा दिल खोने का प्रमाण मिलता है। साथ ही यह भी पता चलता है कि दिल खोने के बाद ये लोग पुलिस में रपट लिखाने की बजाय गाना गाते थे। इससे यह भी साबित होता है कि नायक या नायिका को जब नींद नहीं आती थी तो उन्हें फट से पता चल जाता था कि यह इनसोम्निया की समस्या नहीं है बल्कि दिल खोने के कारण हो रहा है। वे कभी डॉक्टर के पास नहीं जाते थे क्योंकि उन्हें विश्वास रहता था कि दिल खो जाने की वजह से उपजी ऐसी स्थित में न तो डॉक्टर के पास जाने की जरूरत है न पुलिस के पास जाने की। इस समस्या को गाना गाकर सॉल्व किया जा सकता है क्योंकि गाने में ‘ कोई जाए जरा ढूंढ के लाये ‘ कहने से कोई न कोई दिल ढूंढ कर ला देगा और नींद न आने की समस्या सुलझ जायेगी।”प्रेम-प्रसंग में दिल के महत्व की और जांच-पड़ताल करके शोधार्थी लिख सकता है; “शोध से हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि उनदिनों दिल दिए और लिए तो जाते ही थे, वे तोड़े भी जाते थे। एक प्रसिद्द गीत ‘दिल के टुकड़े-टुकड़े करके मुस्कुराते चल दिए …’ से हम इस निष्कर्ष पर पहुँच सके। यह बात अलग है कि किसी ने इस बात पर कोई शोध नहीं किया कि दिल टूटने के बाद कैसी आवाज़ सुनाई देती थी? कई गीतों से ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि अक्सर दिल टूटने का इलज़ाम नायिका के ऊपर मढ़ दिया जाता था लेकिन कुछ ऐसे केस भी हुए जब नायक ने खुद ही अपना दिल तोड़ लिया हो। जैसे एक गीत ‘जिस दिल में बसा था प्यार तेरा उस दिल को कभी का तोड़ दिया …‘ से यह पता चलता है कि कभी-कभी नायक खुद ही अपना दिल तोड़ लिया करता था। वैसे टूटने के बाद दिल के टुकड़े कैसे दिखाई देते थे इसबात पर कहीं कोई दस्तावेज़ नहीं मिलता। ‘दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा बरबादी की तरफ ….‘ नामक गीत से यह प्रमाण मिलता है कि दिल टूट जाने के बाद आबादी की तरफ चलते रहने वाले नायक बर्बादी की तरफ मुड़ जाता था और अपना सत्यानाश कर लेता था।”

“दिल केवल टूटते ही नहीं थे, वे गाने भी गाते थे। ‘हर दिल जो प्यार करेगा, वो गाना गायेगा ..’ जैसे गीत से इसबात का पता चलता है कि केवल नायक ही प्यार नहीं करता था। किसी-किसी केस में दिल भी प्यार कर बैठता था और हर वो दिल जो प्यार कर बैठता था वह गाना भी गाता था। यह बात अलग है कि दिल के गाये गाने कैसे होते थे इस बात की कहीं चर्चा नहीं हुई है। इतिहास में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है कि मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर वगैरह अच्छा गाते थे या फिर दिल। वैसे कुछ फ़िल्मी इतिहास्यकारों का मानना है कि वैसे तो उन्होंने दिल को गाते हुए कभी नहीं सुना लेकिन उन्हें पूरा विश्वास है कि साबुत दिल की तो छोडें, टूटा हुआ दिल भी किसी अनु मालिक, शब्बीर कुमार, मोहम्मद अज़ीज़ या कुमार सानू से अच्छा गाता होगा। उनदिनों दिल गा सकता था या उससे आवाज़ आती थी, इसबात का प्रमाण ‘दिल की आवाज़ भी सुन, मेरे फ़साने पे न जा …’ नामक गीत से मिलता है। नायक नायिका से नायिका नायक से अक्सर रिक्वेस्ट करते थे कि दोनों अपने माँ-बाप की बात सुनने की बजाय दिल की आवाज़ सुने तो प्रेम की वैतरणी पार करने में आसानी रहेगी।”

जहाँ दिल के गाने की बात साबित होती है वहीँ दिल के शायर होने की बात का भी पता चलता है। दिल आज शायर है, गम आज नगमा है ..गीत से पता चलता है कि दिल के अन्दर गाने का तो टैलेंट होता ही है, वह चाहे तो शायरी भी कर सकता है और गम को नगमों में परिवर्तित कर प्रेम में अपना योगदान दे सकता था.कहीं-कहीं दिल के मंदिर होने की बात भी सामने आती हैं। जैसे ‘दिल एक मंदिर है, प्यार की इसमें होती है पूजा, ये प्रीतम का घर है …’ गीत से ऐसा प्रतीत होता है कि नायिका का दिल के मंदिर होने में प्रगाढ़ विश्वास है। इसके पहले कि किसी के मन में यह प्रश्न उठे कि; अगर दिल मंदिर है तो उसमें कौन से भगवान् विराजमान हैं?; नायिका खुद ही गीत के आगे की पंक्तियों के माध्यम से इस बात का खुलासा कर देती है कि इस मंदिर में प्यार की पूजा होती है। दिल रुपी मंदिर अन्य मंदिरों से इस मामले में अलग है कि प्यार की पूजा में फूल, दीपक, घी, अगरबत्ती वगैरह के प्रयोग की ज़रुरत नहीं पड़ती। कुछ इतिहास्यकारों ने प्रीतम की पूजा की बात करके यह साबित करने की कोशिश की थी कि नायिका इस गीत के माध्यम से संगीतकार प्रीतम की पूजा करने की बात कर रही है लेकिन इस थ्योरी को यह प्रमाण देकर मार गिराया गया कि संगीतकार प्रीतम का जन्म उस समय नहीं हुआ था जब नायिका ने यह गीत गाय था।
दिल केवल टूटते नहीं थे। कुछ गीतों से पता चलता है कि दिल कहीं भी आ जा सकते थे। जैसे ऐ मेरे दिल कहीं और चल …गीत से पता चलता है कि नायक जब कभी भी किसी एक जगह से बोर-सोर हो जाता था तो दिल को सजेस्ट करता था कि वह कहीं और चले। वह कहीं और चलेगा तभी नायक को भी उसके साथ नई जगह जाने का मौका मिलेगा और उसकी बोरियत दूर हो सकेगी। इस गीत में नायक दिल को उकसाते हुए उससे कहता है कि वह न सिर्फ कहीं और चले बल्कि कोई नया घर भी ढूंढ ले। कुछ इतिहास्यकारों का मानना है कि शायद नायक वन रूम किचेन में रहकर बोरियतगति को प्राप्त हो गया था और उससे निकलने का यही तरीका था कि वह दिल को उकसाए ताकि वह न सिर्फ खुद कोई नया घर ढूंढें बल्कि नायक को भी उपलब्ध करवाए।
टूटने और आने-जाने के अलावा दिल जलते भी थे। नायक द्वारा गाये गीत; ‘दिल जलता है तो जलने दो …’ से यह बात सामने आती है कि नायक को इस बात से कोई गुरेज नहीं

गाते थे या फिर दिल। वैसे कुछ फ़िल्मी इतिहास्यकारों का

होता था कि उसका दिल जल रहा है. उसे इस बात की चिंता नहीं थी कि अगर अगर दिल जलने लगा तो हो सकता है आग उसके कुर्ते में भी लग जायेगी और कहीं उसको बीच बाज़ार सबसे सामने कुर्ता उतार फेंकना न पड़ जाए। कुछ इतिहास्यकारों ने इस गीत के बारे में अनुमान लगते हुए लिखा है कि शायद नायक के मित्र ने उसके दिल को जलते हुए देखा होगा और जब उसने बताया कि नायक का दिल जल रहा है तो बिंदास नायक ने उसको दो टूक कह दिया कि दिल जलता है तो जलने दो। ऐसे नायक को कालांतर में लोगों ने दिलजला कहकर पुकारना शुरू किया।
दिल में किसी के लिए प्यार-स्यार तो रहने की बात आम थी लेकिन आश्चर्य की बात यह कि कभी-कभी नायक के दिल में भंवरा भी रहता था। जैसे गीत ‘दिल का भंवर करे पुकार, प्यार का राग सुनो, प्यार का राग सुनो रे …’ से प्रमाण मिलता है कि नायक के दिल में भंवरा रहता था और वह केवल प्यार का राग गाता था। उसे मालकौस, भीमपलासी, मल्हार वगैरह गाने में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। दिल में रहने वाला भंवर जब भी गाता प्यार का राग ही गाता था और नायक नायिका से कहता था कि वह प्यार का राग ही सुने और बाकी के रागों को अनसुना कर दे।
हो सकता है शोधार्थी आखिर में अपना शोधपत्र यह लिखते हुए खत्म करे कि ; “कालांतर में परिवर्तन ऐसा हुआ कि पहले के दिनों में दिल में रहने वाले नायक-नायिका को बाद में दिल में जगह नहीं मिल पाती थी। यही कारण है कि बाद के दिनों में नायिका ने इस बात से समझौता कर लिया कि नायक के दिल में जगह की कमी है। ऐसी स्थिति में उसे लगा कि चूंकि अन्दर बसना ईजी नहीं रहा इसलिए अगर नायक मुझे दिल में बसाने की जगह मेरी फोटो ही अपने सीने से लगा ले तो भी बहुत बड़ी बात होगी। ऐसे में उसने गाना शुरू किया; ‘मेरे फोटो को सीने से यार चिपका ले सैयां फेविकोल से ….मैं तो कब से हूँ रेडी-तैयार पटा ले सैयां मिस्ड काल से …” इस गीत से यह साबित होता है कि पहले नायक के दिल में बसने वाली और अपने दिल को मंदिर माननेवाली नायिका अब दिल कॉन्सस होने के बजाय ब्रांड कॉन्सस हो चुकी थी। वह अब इस बात से ही संतोष कर लेती थी कि नायक उसे दिल में बसाने की बजाय उसके फोटो को ही सीने से चिपका ले तो भी बहुत बड़ी बात होगी। हाँ, वह ब्रांड कॉन्सस ऐसी है कि किसी भी लोकल अढ़ेसिव ब्रांड से अपनी फोटो नहीं चिपकने देगी बल्कि यह साफ़ बता देना चाहती है कि अढ़ेसिव की बात पर केवल फेविकॉल ही ………………………
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पेशे से अर्थ सलाहकार. विचारों में स्वतंत्रता और विविधता के पक्षधर. कविता - हिन्दी और उर्दू - में रुचि. दिनकर और परसाई जी के भीषण प्रशंसक. अंग्रेजी और हिन्दी में अश्लीलता के अतिरिक्त सब पढ़ लेते हैं - चाहे सरल हो या बोझिल.

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