गांधी से कहके हम तो भागे,
कदम टिकते नहीं साहब के आगे
रंज लीडर को बहुत है
मगर हार के बाद

कुछ ऐसा ही हुआ महसूस हुआ रिकार्ड तोड़ जुमलों, मनभावन वादों, तीखे आरोपों प्रत्यारोपों, जीत के डपोरशंखी दावों, वोटर्स के उत्साह, मीडिया की सनसनी, सेफोलॉजिस्ट्स के अनुमानों के बीच लड़े गये पाँच राज्यों के चुनावों के परिणाम घोषित होने पर. इन पर हो रहे विधवा विलाप या जबरदस्त जश्न पर सप्ताहांत का खाली दिमाग कुछ ऐसा अलाप करने लगा.

अलाप का आरम्भ सदूर उत्तर पूर्व के छोटे राज्य से हुआ. मणिपुर से शुरुआत करना उत्तर पूर्व के राज्यों को लोपक का एक सांकेतिक मुआवजा है क्योंकि आम तौर पर हमारी नजर वहाँ तक जाती नहीं और उनकी आवाज हम तक पहुँच पाती नहीं. नयी सरकार बन चुकी है. सरकार बनना कोई उपलब्धि हो या न हो, लुटियन सर्किल में एक दो दिन चर्चा का विषय बन जाना मणिपुर की एक उपलब्धि अवश्य है. अश्व मंडी लगने के आरोप लगाए जा चुके हैं किन्तु इनमे कोई नवीनता नहीं है. बहस तो इस बात पर होनी चाहिए कि खंडित जनादेश अश्व मंडी का सबसे प्रमुख कारक है या नहीं या इस बात पर कि खंडित जनादेश का सम्मान करते हुए राष्ट्रपति शासन लगाकर अश्व मंडी को लगने से रोका दिया जाए. अलबत्ता निवर्तमान मुख्यमंत्री ने इस्तीफा देने में आनाकानी करके नयी तरह की सनसनी बनाने का जी तोड़ प्रयास किया जिसके लिए उन्हे साधुवाद सहित हमेशा याद किया जाएगा.

छोटे राज्यों की अधिकतर वकालत की जाती है. ये राज्य हमें निराश भी नहीं करते. अक्सर खंडित जनादेश देकर लोकतंत्र का रोमांच बनाए रखते हैं. खरीद फरोख्त का खुला अवसर देकर ‘इक्वालिटी’ तथा ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ सुनिश्चित करते हैं. गोवा भी ऐसा ही राज्य है. भारत के रक्षा मंत्री को गोवा पर पश्चिमी सभ्यता के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए दिल्ली को अलविदा कहकर गोवा जाना पड़ा. खरीद फरोख्त हुई या नहीं, पक्का नहीं कह सकते पर ‘सर्वाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ अवश्य सुनिश्चित हुआ, सबको बराबर का मौका देकर. हारा हुआ दल सुस्त निकला, जीता हुआ चुस्त. हद तो तब हुई जब हारे हुए दल को दिशा देने गये एक माननीय पर दलीय विधायकों ने ही ताबड़तोड़ आरोप लगा दिए.

पंजाब के चुनाव परिणाम निराश कर गए. वाया बाघा बॉर्डर आने वाली क्रांति सहसा ठिठक सी गयी. नशे के चंगुल में फँसे राज्य को नीलकंठ मुख्यमंत्री (जो जनहित में विष समान समस्त मादक द्रव्यों को पी जाने का माद्दा रखते हो) मिलने की आस धरी की धरी रह गयी. दिल्ली में क्रांति के एंटीसिपेट्री पोस्टर्स व कथित इंटरनल सर्वे से क्रांति दल की जो किड़किड़ी हुई सो अलग. क्रांति दल के कलही अधिपति ने अपने छह वॉलंटियर्स वाले बूथ पर तीन वोट पाने पर सवाल उठाकर अपनी आदत के अनुसार खुद का फलूदा फैलाया. उनको कौन बताए कि उनके छह में से तीन वॉलंटियर्स ‘दुगो फूटले फूटल आ एगो के पेन्दी ना’ टैप थे. बेशक पंजाब में उब और खीझ के बादल छँट गये. कैप्टेन आ गए लेकिन डिप्टी कैप्टेन बनने की आस लगाए बैठे एक हँसोड़ माननीय जो इन पर, उन पर और सब पर कारण-अकारण हँसते रहते हैं, पर लोग खूब हँसे.

देवभूमि उत्त्तराखंड इस बार कुछ ऐसा कर गुजरा कि बहुमत के लिए तनी हुई रस्सी पर चलने का करतब दिखाने की उसकी बाध्यता जाती रही. पुष्ट बहुमत से दुखी अश्व मंडी एक्सपर्ट्स औंधे मुँह गिरे. किन्तु जीतने वाले दल के लिए मुख्यमंत्री चुनना बहुमत जुगाड़ने से थोड़ा भी कम नहीं था. उत्तराखंड में ‘च्वायस ऑफ प्लेन्टी’ का आलम यह था कि पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी उतने मुख्यमंत्री उम्मीदवार नहीं थे. बहरहाल, उत्तराखंड ने त्रिवेन्द्र रावत के रुप में एक सक्षम मुख्यमंत्री पा लिया है. आशा है कि वह देवभूमि को विकोसोन्मुख रामराज्य की तरफ ले जाएंगे और छोटे राज्यों के गठन की सार्थकता पर मुहर लगाता हुआ कम से कम एक कारण देश के समक्ष रखेंगे. इससे बहुमत जुटाने के लिए होने वाले मनोंरंजक प्रहसन से वंचित जनता को वाजिब मुआवजा मिल जाएगा.

यूपी ने स्पष्ट जनादेश देकर राज्यों के सामने बड़े भाई के रुप में फिर एक उदाहरण प्रस्तुत किया है. अनेकों प्रधानमंत्री देने वाले इस राज्य को सरकारों ने अब तक बड़े भाई का त्याग करने को ही विवश किया है जिसके कारण इसके अधिकांश हिस्से शाइनिंग इंडिया से मीलों पीछे हैं. यूपी ने प्रचंड बहुमत से बोलते हुए काम को गूँगा बना दिया और यह भी बता दिया कि यूपी को किसका साथ पसंद है, हारने वाले हतप्रभ कर दिया एवं जीतने वाले को आश्चर्यचकित. हारे को हरिनाम से संतोष न करते हुए बुआ जी ने ईवीएम रिगिंग के आरोप लगाकर और बबुआ जी ने दबी जुबान उसका समर्थन करके चुनाव हारकर भी दिल जीतने का मौका तक गँवा दिया. वैसे तो हाथ की रेखाओं को छोड़कर हर जगह टैम्परिंग और रिगिंग हो सकती है, ईवीएम में भी किन्तु ऐसे आरोप इसी चुनाव में ऐसे परिणामों पर ही लगाना थोड़ा बहुत हास्य पैदा कर ही गया. लेकिन ईवीएम रिगिंग के आरोपों पर पजामे से बाहर होने वालों को याद दिलाना जरुरी है कि सत्तर के दशक के प्रारम्भ में एक प्रखर राष्ट्रवादी ने चुनावों में मुहर के लिए चमत्कारिक स्याही के प्रयोग का आरोप लगाया था. उधर पिछले लोकसभा चुनाव और बिहार विधान सभा चुनावों में धारा के साथ बहते हुए रणनीतिकार से चाणक्य बन गये महानुभाव ने देश की सबसे पुरानी पार्टी को अपना दल से भी नीचे खिसकाकर यह संदेश देने की कोशिश की – लहर सत्यम रणनीति मिथ्या.

चुनाव जीतना जितना कठिन था, उससे अधिक कठिन साबित हुआ एक अदद मुख्यमंत्री चुनना. एक के बाद एक नाम उछलते रहे. कुछ नामों पर विचार हो रहा था, कुछ का नाम स्रोत ऐंवी उछाल रहे थे. विभिन्न स्रोतों से आती विरोधाभासी खबरों से तंग आकर आम जन स्रोतों को आपस में गुत्थमगुत्था कराके हकीकत जानने के मूड में आ गये थे. कुछ नाम उनके समर्थकों द्वारा हिरिस बुताने के लिए उछाला जाता रहा. इन सबके बीच ट्विटर पर #सतपरकास4UPCM का ट्रेंड सब कुछ बदलने वाला था किन्तु ऐसा समझा जाता है कि मनचले भक्तों के गुरुवर सतपरकास इसके लिए राजी नहीं हुए. लोकतंत्र का रोमांच चरम पर तब पहुँचा जब कुछ ऐसे नाम भी उछाले गये कि लोग कौतूहल में पूछ बैठे; “ई के हs हो”. बहरहाल, जबरदस्त मशक्कत के बाद हीरा ढ़ूँढ़ ही लिया गया जिसे जनादेश की स्पिरिट में लिया गया फैसला कहा जा सकता है. योगी आदित्यनाथ का नाम सुनते ही पूर्वांचल में लोग खुशी में लंबी खोज पर चुटकी लेने लगे; “गोदी में लइका आ शहर में ढ़ोल”.

लोकतंत्र का पर्व अपने परंपरागत उल्लास, उत्साह और उमंग के साथ संपन्नन हो गया. इस बात की थोड़ी टीस जरुर रही कि हारने वालों ने हार को गरिमा के साथ स्वीकार नहीं किया. किन्तु आशा की जानी चाहिए कि जीतने वाले इसकी भरपाई कर देंगे जीत को नम्रता पूर्वक जनादेश के जज्बे के साथ शिरोधार्य करके. सनद रहे कि लोकतंत्र में नेता या सरकार को कोसने का शौक चुनावों में उन्हे चुनने के उत्साह का समानुपाती होता है.

लेखक – राकेश रंजन (@rranjan501)

1 COMMENT

  1. पांचों राज्यों के चुनाव परिणामों पर अत्यंत सटीक व रोचक लेख. नीलकंठ मुख्यमंत्री – नया तमगा

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