आज आपको एक कहानी सुनाता हूँ। बहुत पहले जंगल में लोकतंत्र की स्थापना हुई। उसी जंगल में एक खलीलाबाद नाम का उपवन था। उस उपवन में गधों की आबादीचालीस फीसदी थी। जब लोक तंत्र आया तो शेर जो कि वहाँ अल्पसंख्यक थे, का राज खत्म हो गया। अब गधों के प्रभुत्व के भय से अन्य जानवर गधों के खिलाफ लाम बंद होने लगे। पुरानी पार्टी ने गधों के सर्वहारा वर्ग की सहायता से शेर शाही को खत्म किया था। अब उन्होंने एक गधे को टिकट दिया, उसे कई बार माननीय बनवाया।

अन्य जानवरों ने सोचा कि गधे भी अब शेरों की तरह हुकुमत करने लगे हैं अतः नई पार्टी बनाई। नई पार्टी का मुख्य कैडर हिरण थे, जिनकी आबादी बीस फीसदी थी, जो जानवरों में गधों के बाद सर्वाधिक थी। लेकिन पहले शेरों और अब गधों के प्रभुत्व से सशंकित अन्य जानवर नई पार्टी का नेतृत्व हिरणों के हाथ में कतई नहीं देना चाहते थे। अन्य सभी जानवर कोई दो फीसदी, कोई तीन फीसदी था। उनमें से एक समझदार खरगोश को अन्य जानवरों ने नई पार्टी का कैंडिडेट बनाया।

हिरण, जो कि नई पार्टी का स्वयंभू नेता बने बैठे थे, इस बात से नाराज हो निर्दलीय लड़ने लगे, कुछ हिरण गधों को भी सपोर्ट कर देते और इस तरह नई पार्टी हार जाती। अब माननीय गधे के मरणोपरांत उसके पुत्र माननीय हो गए और इस तरह शेर शाही की जगह गधा शाही हुकुमत आ गई लेकिन ‘सच्चा लोकतंत्र’ नहीं आ पाया। एक बार नई पार्टी ने हिरण को टिकट दिया तो उस खरगोश ने अन्य जानवरों से गधे को वोट दिलवा दिया, परिणाम वही ढाक के तीन पात।

ट्विस्ट

अब नई पार्टी को लगा कि खलीलाबाद सीट से सिर्फ और सिर्फ एक गधा ही जीत सकता है। इस परम ज्ञान की प्राप्ति होते ही नई पार्टी ने आनन फानन में पता लगाया कि माननीय गधा जो कि स्वर्गीय माननीय के पुत्र हैं, थोड़े भूरे गधे हैं, जबकि खलीलाबाद में सफेद गधे बहुमत में है, अतः उन्होंने एक सफ़ेद गधे को टिकट दे दी।

अन्य जानवरों के साथ ही हिरणों को भी लगा कि अब तो एकमात्र पार्टी भी हाथ से निकल गई अतः मीटिंग बुला निर्णय लिया गया कि इस बार हिरण भी अन्य जानवरों के साथ ही बूढ़े खरगोश को सपोर्ट कर दे, वैसे भी खरगोश की उमर हो चली है, ये अंतिम चुनाव है।

गधों में भी गोष्ठियां होने लगी, कुछ गधों ने सोचा कि अगर हम नई पार्टी के गधे को विजयी करते हैं तो नई पार्टी भी आगे से गधों को ही टिकट देगी और इस तरह दोनों पार्टियों से गधे चुनाव लड़ेंगे, हार-जीत जो भी हो भविष्य में चुनाव कोई गधा ही जीतेगा। लेकिन कुछ गधे माननीय के प्रति वफादारी से चिपके रहे और इस चक्कर में गधा वोट बैंक का बंटाधार हो गया।

खरगोश हिरणों और अन्य जानवरों की मदद से भरी बहुमत से जीत गया और नई पार्टी देखती रह गई। तमाम राजनैतिक पंडित इस बात पर विचार कर रहे हैं कि जो खरगोश कभी पार्टी के टिकट पर चुनाव नहीं जीत पाया वो इस बुढ़ापे में निर्दलीय कैसे जीत गया? अब खरगोश को पार्टी व्हिप भी नहीं माननी पड़ती, पार्टी की चाटुकारिता भी नहीं, विधान सभा में खुल कर बोलता है।

इस तरह खलीलाबाद उपवन में सच्चे लोक तंत्र की स्थापना हुई लेकिन इसकी बुनियाद जातिवाद ही थी।

लेखक : श्रवणनाथ सिद्ध (@LovesPuja)

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