मेढ़कों को तराजू के दो पलड़ों पर रखकर आप भले ही तौल लें पर चुनावी मौसम में माननीयों का लोकतंत्रीय उछल-कूद (मने दलबदल) रोकना लगभग असंभव है. माननीयों के उछल-कूद के अनेकों फायदे हैं. इससे लोकतंत्र हॉट एंड हैपेनिंग टैप जीवन्त दिखता है. इससे अपना वोट जाया करने को तैयार बैठे वोटर का मनोरंजन होता है. ऐसे उछल-कूद बाइट के लिए टाइट रहने वाले आठ पहरिया चैनलों को ब्रेकिंग न्यूज दिखाने का अवसर देते हैं. साथ ही ये विभिन्न दलों में टिकट वितरण की पात्रता में संतुलन स्थापित करते हैं. ‘द्रव सदैव अपना तल ढ़ूँढ़ लेता है’ की तर्ज पर इससे अनेक दलों में टिकटीय पात्रता का प्रवाह सुनिश्चित होता है.

दलों का किसी के कहीं आने जाने पर पाबंदी लगाना दल को दलदल बनाने जैसा है – जो धँस गया, वो फँस गया. यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है. हमें तो यहाँ तक लगता है कि दलबदल कानून स्वयं में अलोकतांत्रिक है. किसी के आने जाने, खाने पीने पर कोई प्रतिबंध अलोकतांत्रिक ही माना जाएगा. ‘चौपाया बाँधकर रखा जाता है, दोपाया नहीं’ इस कहावत के पैमाने पर दलबदल कानून हमारे माननीयों को चौपाया श्रेणी में डालता हुआ प्रतीत होता है. माननीयों के प्रति यह अन्याय सर्वथा अवांछनीय है.

लोग नाम, काम और धाम बदल लेते हैं. नौकरियां बदली जाती हैं, कंपनी या संगठन बदले जाते हैं, निष्ठाएं तक बदल दी जाती हैं. प्रेमी प्रेमिकाएं बदलते हैं और प्रेमिकाएं प्रेमी. आचार विचार और दृष्टिकोण मौसम की तरह बदले जाते हैं. गिरगिट रंग बदलते हैं, अनेकों लोग मानवीय स्वभाव को गिरगिटिया भाव में बदल लेते हैं. इन पर तो कोई कुछ नहीं कहता. तो फिर माननीयों की उछल-कूद पर इतनी हाय तौबा क्यों?

दलबदल को राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि का जरिया बताने वाले दिवास्वप्न से बाहर निकलें. चंटई के पेशे में परमार्थ की अपेक्षा करना टू मच है. दल की दरी बिछाने वाले काडर भी पैराड्रॉप टिकटधारी के खिलाफ रोना धोना बंद करें. उस काडर को पैराशूट का प्रयोग करने से रोका तो नहीं गया था. ‘सर्वाइल ऑफ द फिटेस्ट’ जीवन के हर क्षेत्र में चलता है. राजनीति में इसे शिथिल क्यों किया जाए? सर्वाइवल के लिए हाथ पैर मारने का हक सबको है. माननीयों को भी इस हक से वंचित नहीं किया जा सकता.

चार धामों का तीर्थाटन मोक्ष सुनिश्चित करता है. इसी तर्ज पर चार दलों में सार्थक, सोद्देश्य व सफलतापूर्वक की गयी उछल-कूद पर माननीयों को यदि राजनीतिक मोक्ष का पात्र माना जाए तो उछल-कूद को बढ़ावा मिलेगा और लोकतंत्र में दलों का दलदल कम करने में मदद मिलेगी. एक मित्र हैं जो आजकल छनके हुए हैं, पहले भी बिदके थे एक बार किन्तु बाद में सुलह हो गयी थी. उन्होने पुरातन वंशवादी पार्टी त्यागकर हाथी की सवारी की थी. सिस्टम की गंदगी नहीं देख सके तो झाड़ू उठा लिए, आजकल राष्ट्रवादी तेवर चमका रहे हैं. इनकी खासियत है कि जहाँ भी जाते हैं, पूरी शिद्दत से जाते हैं और चोले का रंग समरुपी कर लेते हैं. राजनीतिक मोक्ष के हजारों दावेदारों में एक नाम इनका भी होना चाहिए.

दलबदल कानून से पहले उछल-कूद अधिक होता था. इसने हमारे लोकतंत्र के पुष्पित, पल्लवित और परिपक्व होने में अग्रणी भूमिका निभायी है. किन्तु दलबदल कानून के बाद भी उछल-कूद एनथुजियास्ट्स ने लोकतंत्र को कमजोर नहीं होने दिया. बिहार से एक पिछड़े माननीय जिनके पिता भी माननीय थे, ने सवा दर्जन उछल-कूद करके लोकतंत्र को पुष्ट किया है. बिहार से ही एक सवर्ण माननीय जिनके पिता भी सम्मानित समाजवादी माननीय थे, तो खुद को राजनीति का हनुमान बताते रहे. उछल-कूद के कारण उनके राम हमेशा बदलते रहे. अंतिम बार सेटिंग न हुई तो राजनीति से सन्यास ले लिए किन्तु जाते जाते बेटे को विधान सभा पहुँचा ही आए. पूर्वांचल के एक माननीय जो पुरातन वंशवादी पार्टी की तरफ से टीवी पर सेकुलरिज्म की आवाज हुआ करते थे, ने ऐसी वर्स्टाइल उछल-कूद दिखायी कि राष्ट्रवादी ज्वार में सांसद बन गये और सुना है कि आजकल शाखाओं का मुआयना भी करने लगे हैं. एक माननीय ने तो रातों रात कांग्रेस को लोकतांत्रिक बना दिया था यूपी मे और विधायक दल को प्रदूषित होने से बचाने की नयी विधि बतायी थी. एक अन्य माननीय जो मुख्यमंत्री भी रहे, तेवर और कलेवर बदलकर उछले थे किन्तु उछलना रास न आया तो वापस आ गये. वैसी पूछ नहीं रही, फिर भी राजनीतिक पेंशन पा गये हैं लाट साहब बनकर. ऐसे माननीय धन्य हैं जो लोकतंत्र को धन्य करने के मिशन पर हैं.

हमारे कुछ माननीय उछल-कूद में आलसी होते हैं. सिर्फ उसके संकेत छोड़कर ही दल में अपना काम बना लेते हैं. कुछ रणनीतिक रुप से आलसी बनते हैं ताकि उनकी हरकतों से चिढ़कर उनका दल उन्हे उछाल दे और उसी वेग से वह मनचाही डाली पर टँग जाएं. लेकिन कुछ दल भी चंट होते हैं, रणनीति समझकर चुप्पी साधते हुए ‘शॉटगन’ को तमंचा बना देते हैं. ऐस चंट दलों से कोफ्त होती है और दल पीड़ित माननीय से सहानुभूति.

जिस समय गुट निरपेक्ष आंदोलन चरम पर था तब दुनिया सबसे ज्यादा दो गुटों में बँटी हुई थी. किन्तु लोकतंत्र में यह लागू नहीं होता. निर्दलीय ही लोकतंत्र में दलों का दलदल समाप्त करेंगे. झारखंड ने इसका अनूठा प्रयोग किया था एक निर्दलीय को मुख्यमंत्री बनाकर. लोकतंत्र को दलों के दलदल से मुक्त करने का एक और शुभ संकेत पूर्वोत्तर के एक राज्य में मिला था जब एक दल का लगभग पूरा विधानमंडल उछल गया था दल के दलदल को सफलतापूर्वक चुनौती देते हुए. इन सबसे दलों का दलदल कुछ समाप्त हुआ और लोकतंत्र मजबूत भी हुआ.

कुछ माननीय इतने चतुर होते हैं कि उछलने से पहले दो तीन डाल को टार्गेट कर लेते हैं. जहाँ गुरुत्वाकर्षण मजबूत दिखा, वहीं लैंड कर गये. गुरुत्वाकर्षण पुरानी डाल का ही भारी पड़ा तो वहीं धँस लिए. एक माननीय तो इतने प्रतापी निकले कि यूपी विधान सभा चुनावों के टिकट के लिए अपने दल सहित सभी प्रमुख दलों में टिकट की अर्जी लगा आए. कोई जोखिम न लेते हुए पीस पार्टी, खीस पार्टी व टीस पार्टी तथा अपना दल, सपना दल व हड़पना दल पर भी एक एक रुमाल फेंक दिए. दुर्भाग्य से कहीं बात न बनी तो भी हिम्मत नहीं हारे और निर्दलीय ताल ठोक रहे हैं चुनावों में इस नारे के साथ:

सब दलों में दलदल है.
सबसे अच्छा निर्दल है..

लेखक द्वय – आशुतोष दीक्षित (@Cawnporiah) एवं राकेश रंजन (@rranjan501)

1 COMMENT

  1. आज के चुनावी परिप्रेक्ष्य में अत्यंत सटीक चुटीला लेख. सही. पार्टी धारा में अन्य पार्टियों के असंतुष्ट माननीयों का मिलन प्रवाहित न हो तो दलदल ही रह जाएगी न.

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