यदि आप बम्बई या दिल्ली में रहते हैं तो पाएँगे की दीवाली की लम्बी छुट्टियाँ बीत जाने के बाद भी सड़कें खाली हैं और यदि पटना या बनारस में रहते हों तो गलियों को भी फलों की दुकानों से ठसा ठस भरा हुआ।

अगर पिछले 3-4 दिनों में CST या आनंद विहार जाना आना रहा हो तो ये स्टेशन भी आपको मोदी की तरह लुक ईस्ट पॉलिसी फॉलो करते दिखे होंगे। यदि इससे आगे बढ़ सूक्ष्म अनालसिस किया हो तो आप फर्स्ट एसी और जेनरल डब्बे में अंतर नही बता पाएँगे।

बाहर से देखने वालों के लिए मेनस्ट्रीम मीडिया के  शब्दों में कहें तो रोजमर्रा के जीवन पर ये “इम्पैक्ट” है छठ का पर आप अगर वहाँ से आते हैं जहाँ से मैं आता हूँ तो छठ आपके लिये भी जीवन का वो हिस्सा होगा जिसका सौदा आप किसी चीज से नही कर सकते।

पिछले एक डेढ दशक में छठ देश के हर कोने में वोट बैंक को साधने के लिए निरन्तर चलने वाले फ्लेक्स चिपकाओ मिनी उद्योग का हिस्सा भी बना है पर इन सब से इतर छठ समाजिक समरसता और आर्थिक समावेश का अपने आप में सबसे अनूठा और सबसे बड़ा उत्सव है ।

जातिवाद,परिवारवाद,मुह्हलावाद,पूँजीवाद आदि हर वाद से परे होता है नदी,तालाब किनारे घाट बनाना ; जो की जिसका पहले जहाँ चला कुदाल उसका वो स्पॉट के बिन कहे नियम पर चलता है। अनुशासन इतना कि लोग भीख माँग के करना पड़ा तो भी करेंगे की मनौती माँगते हैं और फिर धन्ना सेठ हो या डेली वेजर 5 लोगों से कुछ न कुछ माँग के ही व्रत करते हैं । फिर सुबह के अर्घ्य के बाद भी आपको गमछा में गाँठ बाँध कम से कम 5 लोगों से प्रसाद का ठेकुआ,चना,फल भी लेना ही होता है और इस माँगने में कहीँ कोई भेदभाव नही होता। विधान ऐसा है कि आपको किसी विद्वान या पंडित की ज़रूरत नही पड़ती आपके जो अपने हों वो अर्घ्य देने में आपकी मदद कर सकते हैं। सैकड़ों पैरामीटर्स पर बँटा समाज एक साथ एक जुट हो आता है। ये है छठ।

समाग्री की सूची ऐसी है की अपने आप में पूरी माइक्रो इकॉनमी चलती है।बाँस का सुप,पानी वाला नारियल, गन्ना,गाभर,अन्नानास,गाँठ वाली हल्दी,शरीफा,अदरक,चना,मकोय ……..। छठ में आवश्यक कई ऐसी वस्तुएँ हैं जो बिहार-पश्चिमी उत्तरप्रदेश मे नही होतीं फिर भी सप्लाई चेंन मैनेजमेंट का कमाल है कि साल में एक बार के लिए हर कोने में उपलब्ध हो जाती हैं और हज़ारों लाखो घर चलाती हैं। मेरे गाँव में 2004 तक “जाति का नाम ले लेने से हरिजन ऐक्ट के तहत केस हो सकने वाले” रामउदार हुआ करते थे जो कहते थे बबुआजी जेतना आमदनी साल भर के मुअनी के भोज में जग पूरा चिल्लाइला से ना होला, ओतना त छठी मैया सुप बिनला के दे देली। बाँस के सुप के बिना छठ पूजा की परिकल्पना अधूरी है । बच्चे दीवाली मैं  पटाखे नही जलाते, घाट पर चलाने के लिए बचा कर रखते हैं । दीवाली में घर से शुरू हुई साफ सफाई आगे बढ़ती ही चली जाती है और पूरा समाज एक साथ आ कर हर गली ,मुहल्ले से होते हुए घाट तक के हर रास्ते को चमका देता हैम अमुमन गन्दे रहने वाले शहर में बिल्कुल साफ दिखते हैं । आबादी वाले इलाकों से लेकर अरहर के खेतों से होते हुए घाट तक ट्यूबलाइट जिसे हमलोग मर्करी भी कहते हैं बाँसों पर टँग जाते हैं जैसे लोग इस फोटो की तरह रेल में।

लोकआस्था के इस महापर्व में उगते के साथ ढ़लते सूर्य को भी अर्घ्य चढ़ाया जाता है। व्रती घाट तक भुइयाँओपरी करते हुए अर्थात दंडवत हो धरती माता की भी पूजा करते हुए पहुँचतीं/तें हैं और गीतों से एक अलग संसार रच डालते हैं। बिना अन्न जल वाले इस व्रत में लोगों में ये ताकत कहाँ से आती है इसका जवाब कॉस्मिक एनर्जी के क्षेत्र में शोधकर्ता दे पाएँ।

पिछले कुछ सालों में इस पर्व पर भी एजेंडावादियों की गिद्ध नज़र पड़ी है। कहीं किसी घाट के गन्दे छूट जाने से लेकर सुरक्षा और सहूलियत के लिए लगाए जाने वाले टेंट औऱ लाउडस्पीकर्स पर भी भौहें तनी है। छठ के विविधता का सबसे बड़ा उदाहरण है कि ऐसों को जवाब छठ के लोकाचार मे ही समाहित है। शारदा सिन्हा/अनुराधा पौडवाल आदि के आवाज में अपरिहार्य बन चुका एक छठ गीत है – कांच ही बाँस के बहँगिया, बहँगी लचकत जाए जिसका कुल मिला के संदेश ही यही है कि रास्ते में व्यवधान हैं , टेढ़ी नज़रे हैं,सवाल हैं पर कोई न कोई सहाय ज़रूर बनेगा , अर्घ्य का सामान घाट पहुँचेगा , छठ पूजा होगी । मीलॉर्डस् से ले के काने पत्रकारों के लिए भी छठी मैया की जय बोलते हुए लिंक पेश है –  सुनें ।

जय छठी मैया।
Written by Panchdeo Pandey (@ruppanbabu)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here