किसी घनघोर मजबूरी में, घटाटोप भुच्च अनहरिया रात में, सुनसान सड़क पर एकदम अकेले, कहीं चले जाय रहे हों,सन्नाटे का साँय साँय कान सुन्न कर रहा हो, झींगुर टिटही अपना तान राग छेडे इस्पेसल इफ्फेक्ट दे रहा हो और ऐसे में अचानक से सामने एक ऐसा जीव परकट हो जाय ,जो न आज तलक कहीं देखे, न सुने…हाँ, भूत परेत का खिस्सा कहानी में ऐसा विराट वर्णन खूबे सुने रहै और जमकर ओका ठट्ठा भी उडाये रहै …तब ऊ सिचुएसन में सबसे पहिले मुँह औ दिमाग पर का आएगा?? बड़का से बड़का तोप नास्तिक भी आपै आप बड़बडावे लगैगा …

भूत परेत निकट नहीं आवै ,महावीर जब नाम सुनावै “

उस समय जदि भुतवा कहे … ” का रे ससुर, तू तो ढेर विज्ञान बतियाता रहा,अब काहे को बजरंगबली को बुला रहा है बे…हिम्मत है तो चल, हमरे संग सवाल जवाब का हु तू तू खेल के दिखा….”

तब भैया, जरा कलेजा पर हाथ धर के ईमान से कहिये….लेंगे चैलेन्ज,कहेंगे उससे- न न भूत वूत कुछ नहीं होता और न ही हनुमान वनुमान ??

अच्छा चलिए, छोड़िये ये काल्पनिक सिचुएशन, फरज कीजिये, हवाई जहजवा में बइठे, उप्पर दूर अकास में सुखी-सुखी औ खुसी-खुसी उड़े जा रहे हैं…आ ठीक बिच्चेइ असमान में डरैवर साहेब उदघोषणा कर दें…” परम आदरनीय भइया औ बहिनी लोग, हमको बहुतै खेद संग कहना पड़ रहा है कि, बिमनवा में आई तकनीकी खराबी का चलते, अब हम ईका आगे नहीं उड़ा ले जा सकते हैं….सो, भाई बंधू लोग,अब अपना लोटा डंडी समेटो औ छतरिया पहिन के कूद लो हमरे पिच्छे पिच्छे ..हमरी पूरी सुभकमना आप सभौं के साथ है..

अब बताइए,पलेनवा में चढ़े वाला सब लोग असमान से कूदे का टिरेनिंग लेके तब जहजवा में तो बैठते नहीं न… बडका से बडका चुस्त कुदाक के हाथ भी छतरी धरा , जब एतना ऊपर से धकियाया जाएगा त छतरी धर हावा में लटकते अइसन भयंकर सिचुएसन में भाई बहिनी लोग किसको गुहारेंगे ?? जो हनुमान जी का नाम भर भी सुने होंगे, झट बुदबुदाये लगेंगे….

संकट ते हनुमान छुड़ावै,
मन क्रम वचन ध्यान जो लावे…”
जन के काज विलम्ब न कीजै,
आतुर दौरि महासुख दीजै
अब बिलम्ब केहि कारन स्वामी,
कृपा करहु उर अंतरयामी

चलिए, आज उन्हीं बजरंग बली जी की बिना किसी कारण या संकट के भी एक बार सरधा पूरवक याद करते उनके चरित की परिचर्चा उनका जयकारा लगाते करें…

लाल देह लाली लसै ,अरु धर लाल लंगूर |
बज्र देह दानव दलन,जय जय जय कपि सूर ||

अपने ईष्ट श्रीरामजी की ऐसी भक्ति किये बजरंगबली कि भक्त शिरोमणि बन गए…उनके जइसा भक्त बहुतै कम हुए हैं ई धरती पर…..भगति की पराकाष्ठा देखिये, कि उ तो यहाँ तक प्रण ले लिए हैं कि, इस संसार में जा तलक एक ठो भी मनुस के मन ध्यान में श्री सीता राम जी बसेंगे , तब तक उ ओके रक्षा का वास्ते इहै संसार में डटे रहेंगे….बजरंगबली जी की एही एकनिष्ठ सरधा देखकर सीतामैया ने भी उनको वरदान दिया था …

अजर अमर गुननिधि सुत होहु,
करहु सदा रघुनायक छोहू..

ऐसे संकट मोचन हैं बजरंगी, कि अपने भगतों का ही नहीं बल्कि अपने परभू का भी संकट हरण करते हैं… जब भी प्रभु श्रीराम संकट में पड़े ऊ उपस्थित हो गए उनकी सेबा में…हर संकट में जदि कोई एक नाम प्रभु श्रीराम के मुख पर सबसे पाहिले आया तो उ था …हनुमानजी का ही …चाहे सीता मैया को सात समुद्दर लांघ के खोजने का काम हो या कदम कदम पर श्री राम लछमन या जानकी जी सहित धर्म की रच्छा करने का काम…

और उनका शील और विनय तो देखिये कि कभी भी किसी भी काम का क्रेडिट अपने नहीं लिए,सब श्री राम की कृपा को दिए….. शक्ति , भक्ति और युक्ति के चरम का जहाँ कहीं भी जिकर होगा, सबसे पहिला नाम बजरंगबलि का ही आएगा…

वानर सेना जब सीता मैया को खोजते हुए समुद्र किनारे पहुँचे और विराट अथाह उस समुद्र को देख कपारे हाथ धरे सब हिम्मत हार बैठ गए, तो ऐसे समय में भी सर्व समर्थ हनुमान जी तबतक आगे बढ़के उद्धत नहीं हुए जबतक कि जाम्बवंत जी उनको आज्ञा और उत्साह नहीं दिए..शिष्टता यही है कि सेनापति या अग्रज जबतक आदेश न दे,ढ़ेर कूदना नहीं चाहिए। समूह के अनुसासन का एही कायदा होता है..चूँकि सेना में वरिष्ट अग्रज जाम्बवंत जी मौजूद थे, सो हनुमान जी उनका मान रखते हुए तब तक चुप हो बैठे रहे जबतक कि जाम्बवंत जी खुदै आगे बढ़के उनको आदेश न दिए..जो सचमुच में सर्व समर्थ होता है,वह विनयशील अवश्ये होता है,यह हनुमान जी हर समय जताए बताये..

लालुआये पन्जुआये हनुमान जी एकै बार उठे औ हुंकार लेकर जब लंका के ओर उछाल मारे तो – ” जेहि गिरी चरण देई हनुमंता, चलेहिगा सो पाताल तुरंता” …उनका चाप से पहार रसातल में धंस गया…आज जदि किसी के पास एतना ताकत/सामर्थ्य रहे,तो दू मिनट में पूरा दुनियाँ को मचोड़ मचाड़ के, सौस लगाके खा जाएगा.. सामर्थ्य बिना शील और संस्कार के विनाशकारी होता है,यह शास्वत सत्य है…

बजरंग बली खाली बलसालिये नहीं रहे,बडका विद्वान् और चतुर भी रहे..ई बात का परमान जगह जगह पर रामायण में मिलता है…जब लंका के रास्ते बीच सम्मुद्दर में सुरसा उनको खाने को छेकी, त कैसे उको चकमा देके बजरंगबली अपना चतुरता का परदरसन किये, सबे जानते हैं..जब गुप्त रहकर काम बनाना था,गुप्त रह कर बनाये और जब विसाल भूधराकार सरीर परगट कर काम बनाना था,तब वैसा ही किये..सीता मैया को चुप्पे चुप्पे खोज निकालना था,तो मच्छर एतना साइज बनाकर घूम लिए औ जब सतरुअन को प्रभु राम का परभाव देखाना था तो असोक वाटिका को उजार पूरा लंका को जलाकर राख कर दिए…

कल्पना कीजिये ..एकदम अनजान जगह,कोइयो जात जेवार का नहीं, बोली भासा वाला नहीं, चारों तरफ से बिसाल विकराल सर्वभक्षी निसाचर चारों पहर घूम रहे हैं,कब उठाकर मुंह में गड़प जाएँ औ डकारों न लें,कौनो भरोसा नहीं…..ऊपर से दस मुडिया वाला विकराल राच्छस घड़ी घड़ी कहे कि चलो हमसे बियाह करो नहीं तो तुम्हारा चटनी पीस के ई राच्छस लोग खा जायेगा,तुम्हरा पति खोजते रह जायेगा कि कहाँ बिला गयी..नैहर सासुर वाला बोलेगा राम के संग गयी रही जंगल में ,जंगल का दुःख नहीं सहाया होगा, तो भाग भूग गयी होगी कहीं, साथ में फुसफुसाते हुए कहेंगे ” सुने हैं कि लंका का राजा, उसको बियाह करने को उठा ले गया, का जाने बियाह उआह करके ओकरे संग घर बसा ली होगी…” तुम तो बचोगी नहीं जवाब देवे का वास्ते ,जेकरे मुंह में जो आएगा उ कहेगा..हम तुमको उठा लाये,जात तो तुम्हरा ऐसे भी चला ही गया..ई से अच्छा है कि हमरे संग बियाह कर लो,हम तुमका सब रानियन का हेडरानी बना के रखेंगे…बतवा मान लो,परेम से समझा रहे हैं, कहीं दिमाग घूम घुमा गया तो फिर सोच लो,अब और हमरा सबर को न हिलाओ…”

मैया सीता …बेचारी के हिरदय पर का बीतता रहा होगा ई सब सुन सुन कर ,पतिवरता राजरानी का जी केतना पिराता रहा होगा..तबै तो उ खिसिया कर बोली…

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा,,
कबहूँ कि नलिनी कराइ विकासा ||

अस मन समुझु कहती जानकी,
खल सुधि नहीं रघुवीर बानकी ||

सठ सूने हरि आनेहि मोही,,
अधम निल्लज लाज नहीं तोही ||

लेकिन सीता मैया को भीतरे भीतरे तो लगिए रहा होगा कि ई लम्पट मुंहझौंसा पतित का का ठिकाना, दूसरे की मेहरारू को छल से उठा लाने में एगो घड़ी लाज नहीं आया, का जाने आगे का करेगा…बेचारी बेकल हो गयीं होंगी, एतना दिन हो गया था कि ई संसय होना भी वजिबे था कि का जाने प्रभु राम इहाँ तक पहुँच पायेंगे कि नहीं,कहीं उनके आने से पाहिले रावनवा खा पका गया या जोर जबरदस्ती किया तो अबला अकेली उका सामना कैसे करेगी…..बेचारी कलपते हुए अपन ऊ काया का, जाके कारन सब झोर झमेला रहा,ओकरे अंत करने को कभी राच्छसी त्रिजटा से तो कभी वृच्छ असोक से अग्नी मांग रही हैं कि…उहेई समय धप्प से गाछ पर से कुदुक हनुमानजी परगट हो गए प्रभुराम के संदेस के साथ….

धरमहीनों का ऊ नगरी में मैया सीता को कोई पहली बार इतने दिन बाद सनमान सरधा के साथ ‘माता’ कहा होगा….कोई अंदाजा लगा सकता है,उस समय मैया सीता के हिरदय में हर्ष और ममता का कैसा अद्भुद हिलोर उछाह उठा होगा…उसमे भी जब पवनसुत अपना विसाल रूप परगट कर के माता को देखाए होंगे तो निरासा का समुद्दर में डूबे उनके कैसा सम्बल मिला होगा…माता का अपमान का बदला लेने का लिए जब कोई पुत्र उसका अपमान करने वाला का पूरा राज पाट महल अटारी जलाकर ख़ाक कर दे,तो उस हिरदय में गर्व संतोस और ममता का जो उफान उठा होगा और उस हिरदय से जो आशीर्वाद निकलेगा,ऊ कैसे खाली जा सकता है…अरे, माता का आशीर्वाद जब दुर्योधन जैसे पापी को भी बज्र जैसा बना सकता है तो ई तो परम पुन्यवान हनुमान जी थे…
माता ने अपने इस सुपुत्र को अष्ट सिद्धि और नौ निधि का दाता बना दिया।

माता जानकी की किरपा से पवनसुत को जो वरदान मिला, उससे पवनसुत किसी को भी आठों सिद्धि और नवों निधि दे सकते हैं .

और ये आठों सिद्धि और नौ निधि हैं :-

सिद्धि-

१) अणिमा – जिससे साधक किसी को दिखाई नहीं पड़ता और कठिन से कठिन पदार्थ में परवेस कर सकता है..

२) महिमा – जिसमे योगी अपने को कितना भी विशाल आकार का बना सकता है.

३) गरिमा – जिसमे साधक अपने को चाहे कितना भी भारी बना सकता है.

४) लघिमा – जिसमे साधक जितना चाहे उतना हल्का बन सकता है.

५) प्राप्ति – जिसमे इच्छित वस्तु की प्राप्ति संभव है.

६) प्रकामी – जिसमे इच्छा करने पर वह पृथ्वी में समा सकता है, आकाश में उड़ सकता है.

७) ईशित्व – जिससे सब पर शासन का सामर्थ्य पाता है.

८) वशित्व – जिससे दूसरों को वश में किया जा सकता है.

नौ निधि –

पद्म , महापद्म, शंख, मकर, कछप, मुकुंद, कुंद, नील, बर्च्च …

माता पिता या अग्रजों का सरधा और सम्मान पूरवक सच्चे हिरदय से सेवा करने से जो फल मिलता है,उसका इससे परतच्छ उदाहरण औ का हो सकता है…

हो सकता है हनुमान जी,राम जी,कृष्ण जी, आदि आदि ई सब के सब कोरे काल्पनिक पात्र हों, इनका कोई आस्तित्व या वास्तविक आधार न हो…पर किसी ऐसे अवधारणा से ,ऐसे आधार से, जिससे घोरतम संकट में भी उबरने का आस विस्वास मिले, इनके चरित्र से अपने चरित्र को ऊपर उठाने संवारने की प्रेरणा मिले…तो इन चरित्रों को नकारना, उचित होगा क्या ???

सुख ही तो पाने के समस्त यत्न विज्ञान भी कर रहा है,पर इसके कतिपय पुरोधा संगे संग नारा दिए जा रहे हैं कि भूत परेत लछमी दुर्गा राम किसन ई सब अंधविश्वास है…तो अँधा ही सही,यह विश्वास बेहतर नहीं जो व्यक्ति को उद्दात्त चरित्र वाला बनने का प्रेरणा दे ???

लेखिका : रंजना राठौर (@ranjurathour)

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