यह आलेख समर्पित है भारत वर्ष के उन महाप्रतापियों को जिन्होंने भारत वर्ष की संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए असंख्य बलिदान दिए ।

भारत वर्ष के इतिहास में मेवाड़ रियासत का नाम सदैव सम्मान के साथ लिया जाता है । मेवाड़ राज्य के बप्पा रावल, महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप, महाराणा राजसिंह जैसे शासकों ने भगवान एकलिंग नाथ द्वारा शासित इस राज्य की आक्रांताओं से सदैव रक्षा की । मेवाड़ राज्य की स्थापना ईसवी ७३४ में रावल कालभोज द्वारा की थी । राज्य की स्थापना में हरित ऋषि का वही योगदान था जो चंद्रगुप्त मौर्य के समय चाणक्य का रहा । कालभोज ईडर के गुहिल वंश के राजकुमार थे । पारिवारिक कलह के चलते उनकी माता उन्हें वर्तमान एकलिंग जी (उदयपुर) के समीप नागदा गांव ले आई थी । तत्कालीन मेवाड़ की भौगोलिक स्थिति भारत वर्ष में काफ़ी महत्वपूर्ण थी । यह उत्तर दक्षिण व्यापारिक मार्ग और भारत के पश्चिमी तट के बंदरगाहो के निकट होने से और भी महत्वपूर्ण हो गया था । भारत की पश्चिमी सीमा को पार कर दक्षिण तक जाने के लिए मेवाड़ राज्य से गुजरना अनिवार्य था।

महारावल कालभोज गुहिल वंश के आठवें शासक थे । कालभोज ने ईसवी ७३४ से ईसवी ७५३ तक मेवाड़ राज्य पर शासन किया । कालभोज द्वारा अरब आक्रांताओं को लगातार परास्त कर हिंदू धर्म की रक्षा करने के लिए प्रजा उन्हे स्नेह से बप्पा रावल (पितातुल्य सम्राट) के नाम से पुकारती थी । बप्पा रावल ने मेवाड़ में आदर्श और योग्यता आधारित उत्तराधिकारी नियुक्त करने की परम्परा स्थापित की जिसने मेवाड़ को महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप जैसे शूरवीर शासक दिया ।

भारत में अरब आक्रमणों का आरम्भ ईसवी ६३६ में हुआ और ईसवी ७१२ में सिंध पर अरबों का क़ब्ज़ा हो गया । अफगानिस्तान में हिंदू काबुलशाही ईसवी ८७० में ख़त्म हो गयी और भारत वर्ष की स्वाभाविक सीमाओं पर अरब आ धमके । इस्लाम ने पूरे यूरोप एशिया और अफ़्रीका पर अपनी बादशाहत कायम कर ली मगर मेवाड़ के अप्रतिम योगदान से हिंदू धर्म की पताका लहराती रही ।

इस्लाम के जन्म के कुछ ही समय बाद ८ वीं शताब्दी तक अरब आक्रांता सिंध में राजा दाहीर की हत्या कर पूरे सिंध पर क़ब्ज़ा कर चुके थे । इन परिस्थितियों में भारत की पश्चिमी और उत्तरी सीमाएं जर्जर हो चुकी थी । भारत पर हमला दरअसल पर्शिया पर हमले का ही वृहद रूप था। पर्शिया पूर्ण रूप से अरबों के आधिपत्य में था और वहाँ के नागरिकों पर इस्लाम थोप दिया गया था । पर्शिया के बाद सिंध और सिंध के बाद राजपूताने में संघर्ष प्रारम्भ हुआ । अरबों ने फारस को बहुत कम समय में एवं बहुत कम प्रयत्न से जीत लिया था । उसी से उत्साहित होकर अरब सेनाओं ने भारत पर आक्रमण किया जिसमें उनको मुंह की खानी पड़ी । अरब सेनाओं का नेतृत्व मुहम्मद बिन क़ासिम के पास था । साम्राज्य विस्तार के साथ साथ धर्म प्रचार का उद्देश्य लेकर बिन क़ासिम की सेनाओं ने राजस्थान पर हमला प्रारम्भ किया । पश्चिमी सीमा पर प्रतिहार शासक नागभट्ट से हार का स्वाद चख कर अरबो ने दक्षिण पश्चिम राजस्थान पर हमला किया।

हमलो के समय बप्पा रावल जो राजपूताने की दक्षिण सीमा पर क़ाबिज़ थे, ने अजमेर और जैसलमेर के शासकों को अपने साथ मिला कर बिन क़ासिम पर ज़ोरदार हमला किया और बिन क़ासिम की सेनाओं को गाजर मूली की तरह काटना शुरू किया । बिन क़ासिम इस हमले से पूरी तरह हतप्रभ रह गया और उसकी सेना भाग खड़ी हुई । बप्पा रावल ने तब बिन क़ासिम का पीछा सौराष्ट्र, सिंध, और बलूचिस्तान को पार करते हुए गजनी तक किया और गजनी के शासक सलीम को परास्त कर वहाँ मेवाड़ का स्थायी प्रतिनिधि नियुक्त कर दिया । इसी दौर में बप्पा रावल ने वर्तमान पाकिस्तान के रावलपिंडी शहर की स्थापना की । रावलपिंडी को मेवाड़ का स्थायी केंद्र बनाकर उस दौर में बप्पा रावल ने गजनी के पश्चात कंधार, खरसान, इस्फ़हान, तुरान और ईरान पर हमले किए । इन हमलों में मेवाड़ की सेना को अकूत धन सम्पदा हासिल हुई । निरंतर होते हमलों से अरब शासकों ने राजपूताना छोड़ कर यूरोप पर अपना ध्यान केंद्रित करना प्रारम्भ कर दिया ।

बप्पा रावल के हमलों और सामरिक विजय का महत्व इसलिए भी है कि इन हमलों के पश्चात अरब आक्रांताओं ने अपनी रणनीति बदल कर हिंदुस्तान पर ४०० वर्षों तक आक्रमण करने में गुरेज़ किया । अरब मुस्लिम आक्रांताओ ने पहली बार एक ऐसे शत्रु का सामना किया जिसने उन्हें न सिर्फ युद्ध में हरा दिया बल्कि उनका पीछा अरब के रेगिस्तान तक किया और भरी लूटमार कर लौट गया। बप्पा रावल के समय लूटा गया अकूत धन मेवाड़ में सदियों तक सुरक्षित रहा जिसे महाराणा हम्मीर सिंह के काल में अरावली की पर्वतमालाओं में सुरक्षित छिपा दिया गया । इस धन का नक़्शा पीढ़ी दर पीढ़ी भामाशाह के परिवार में सुरक्षित रहा । हल्दीघाटी के भीषण युद्ध के पश्चात भामाशाह ने यह नक़्शा और धन महाराणा प्रताप को लौटा दिया जिससे प्रताप ने सेना संगठित कर मुग़लों को परास्त किया और लगभग पूरे मेवाड़ पर पुनः शासन स्थापित किया । कहा जाता है की महाराणा राजसिंह द्वारा किए गए माणक मोती के तुलादान में भी अरब , ईरान से लुटे गए इसी धन का योगदान रहा ।

निजी जीवन में बप्पा एक बहुत धार्मिक व्यक्ति थे। बप्पा रावल शैव उपासक थे और भगवान एकलिंगनाथ को शासक स्वीकार कर उनके दीवान के रूप में कार्य करने की परंपरा का आरम्भ किया जो आज भी जारी है । उनके द्वारा एकलिंगनाथ का मंदिर कैलाशपुरी में बनवाया गया जो आज भी अपने पूरे वैभव के साथ विद्यमान है ।बप्पा रावल ने २० वर्ष की आयु में मेवाड़ पर शासन करना आरम्भ किया और २० वर्षों तक शासन करने के पश्चात उन्होंने शासन की बागडोर अपने पुत्र महारावल ख़ूमान सिंह को सौंप दिया । अपना शेष जीवन उन्होने एक यति के रूप में व्यतीत किया। बप्पा रावल के विषय में कहा जाता है कि वह पत्थर की मूर्ति के रूप में आज भी भगवान एकलिंगनाथ के समक्ष विद्यमान है ।

बप्पा रावल के जीवन ने तत्कालीन विश्व से यह मिथक तोड़ने का कार्य किया कि अरब अजेय है । कालांतर में उनके वंशजों ने मातृभूमि को अजेय और स्वतंत्र रखने के लिए अनेकों बलिदान दिए । बप्पा रावल के साहस और पराक्रम से प्रेरणा लेकर भारत वर्ष में कई नायको का जन्म हुआ और उन नायको ने हिन्दू धर्म और संस्कृति को अक्षुण्ण रखने में अपने मूल्य योगदान दिए ।

जो दृढ़ राखे धर्म को तेहि राखे करतार
लेखक : नीरज (@neerajs)

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