बाबा वर्षों से मजाक मजाक में ऐसा कह रहे थे पर मोदी जी तो दिल पर ले गये. उन्होने ५००-१००० रुपये के नोट रद्द करने की घोषणा कर डाली. अब बाबा मोदी जी को यह आइडिया देने की दावा करके स्वयं का कविवर कुमार करने पर तुले हुए हैं. यह घोषणा मोदी जी ने तब की जब एनडीटीवी पर बैन और उसकी वापसी के बाद राइट विंग का पारा बहुत नीचे ढ़ुलक गया था. एक अनजान व टुच्चे राजनीतिक आलोचक खदेड़न जी ने फरमाया; “जब मोदी जी से आसक्ति निम्नतम स्तर छूने को होती है, तभी वह कुछ ऐसा कर गुजरते हैं कि भक्ति की हिलोरें फिर से उठने लगती हैं.”

इस बड़ी घोषणा के बाद आम जन (राम जन न पढ़ लें) वाह वाह करने लगे और हम्माम जन (हराम जन नहीं) हाय हाय. वैसे कुछ जगहों से आम जनों के उह, आह व आउच करने की खबरें भी आयी हैं. कुल जमा सात आठ हजार रुपये रखे लेखक द्वय में से एक जन बहुत चिन्तित थे. रात के खाने में उन्होने सिर्फ आठ-नौ रोटियां, सब्जी व सलाद लिया और दूध पीकर सो गये. कुछ चालू टैप आम जन ने सुबह तक अपने एक दो नोट किसी सब्जी वाले या मछली वाले को चिपकाकर पुन: सिद्ध किया कि अज्ञानता कितनी आत्मघाती हो सकती है.

धन कालूओं पर तो गोया वज्रपात ही हो गया. इनमें से न जाने कितनों ने ‘अबकी बार मोदी सरकार’ का जाप किया था. उनकी शिकायत वाजिब है – यही सिला मिलना था. पूर्वांचल के एक छोटे धन कालू के पिता अपने गाँव के बीचों बीच खड़े होकर सरकार को अलंकारिक शब्दावली में रिवर्स साधुवाद देते पाए गए. घोषणा से भन्नाए सेठों के मुलाजिम जो बैन के बाद बहुत खुश थे, दफ्तर/ दूकान में सेठ को खुशामदी सांत्वना देने के लिए रुआँसे हुए जा रहे थे. रुदन क्रुन्दन से मुक्त होने पर अचानक इन धन कालूओं की विस्मृति समाप्त हो गयी और उन्हे अपने गरीब या मध्यवर्गीय रिश्तेदार, मित्र व परिचित अचानक याद आने लगे. सीए साहबों की पूछ और ज्यादा होने लगी. बुद्धि खर्च के सारे रिकॉर्ड टूटने लगे. एमरजेन्सी के लिए माचिस का जुगाड़ भी कर लिया गया.

सरकार की हर घोषणा के बाद विपक्ष अपनी प्रत्याशित व तीव्र प्रतिक्रिया (विरोध भी पढ़ सकते हैं) के लिए सदैव जाना जाता है. किन्तु इस बार ‘रिएक्शन क्रियेशन सॉफ्टवेयर’ क्रैश सा हो गया. घोषणा पर बड़े नेताओं की प्रतिक्रिया के लिए देश और मीडिया तरस गये. अलबत्ता कोलकाता से दीदी ने इस फैसले को वापस लेने की माँग कर दी व दिल्ली के ढ़ीठ जनलोकपाल जी ने रिट्विट कर समर्थन. सुशासन कुमार ने प्रधानमंत्री की पहल का स्वागत किया. किन्तु राजनीतिक प्रेक्षक इस बात पर कयास लगा रहे हैं कि यह मोदी जी की पहल का समर्थन था या लालू जी पर दबाव बनाने का प्रयास या स्वयं को काला धन रहित बताने का संकेत.

आर्थिक मामलों के किसी भी नीतिगत निर्णय के विरोध में एक सर्वकालिक रेडीमेड प्रतिक्रिया है – यह फैसला गरीब विरोधी है व पूँजीपतियों के हित में लिया गया है. किन्तु इस बार शायद ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी. देश ने इस बात पर राहत की साँस ली कि हमारे माननीयों की थेथरई अपने उच्चतम स्तर पर अभी तक नहीं पहुँची. किन्तु सदा की तरह इस फैसले को भी तुगलकी फरमान बताने वाले कई लोग सामने आ ही गए. बिना किसी मेडिकल सर्टिफिकेट किसी मृतक को दिल्ली-दौलताबाद की किर्वदन्ती के आधार पर पागल का मेटाफर बनाने का अन्याय इस बार भी जारी रहा. आशा है कि इस बार तुगलक के वंशज इसका संज्ञान लेंगे और अदालत की शरण जाएंगे.

माननीय गण प्रतिक्रिया के लिए किंकर्तव्यविमूढ़ ही नहीं दिखे बल्कि अंदरखाने की खबरों के अनुसार वे एक दूसरे पर तोहमत लगाते भी पाए गए. एक ने कहा; “और माँगों सर्जिकल स्ट्राइक का प्रूफ …” दूसरे जन ने उन्हे पद्यात्मक सप्लीमेंट दिया …

प्रूफ जो हमने माँगी हाय
हम पर ही कर दिया बताय

स्वघोषित गरीब हितैषी व पूँजीपतियों के प्रबल विरोथी वाम लिबरल बुद्धिजीवी अपने फक्कड़ होने का ढ़िढ़ोरा पीटते हैं. किन्तु इस घोषणा पर गोलमटोल प्रतिक्रिया से इनकी तथाकथित छवि तार तार हो गयी, ढ़िढ़ोरे का ढ़ोल फट गया.

उन वंशवादी राजनीतिक घरानों या प्राइवेट लिमिटेड टैप पार्टियों में मातम पसरा है जिनमे उत्तराधिकार का कोई बड़ा संघर्ष नहीं है. किन्तु सदूर तमिलनाडु से उप्र तक के कुछ घराने इस फैसले से सकते में होते हुए भी यह सोचकर मन ही मन खुश भी हैं कि उत्तराधिकार का असली टंटा ही खत्म हो गया. इससे लोगों में यकीन हो चला है कि घर में आग लगने पर चूहों के समाप्त होने की खुशी मनाने वाले अब भी हैं इस देश में.

निहित स्वार्थ में किसी निर्णय का सीधा विरोध या समर्थन करना बहुत आसान है. सबसे ज्यादा संकट में वे हैं जो टीवी पर फैसले का समर्थन या स्वागत तो कर रहे हैं किन्तु दिल पर अजगर लोट रहा है. अजीब दुविधा है.

कैसी पीड़ा दी हमें भाय
मुख से वाह दिल में हाय

एक माननीय ने तो फैसले को लोकतंत्र विरोधी बता दिया. लाइन में खड़े होने से बचने के लिए कभी वोट नहीं करने वाले लोकतंत्र के टीकाकार अंकित फ्रॉम आइआइटी, चेन्नई ने इस फैसले को तर्क के साथ लोकतंत्र को कमजोर करने वाला बताया. उनका कहना है; “इससे भारत के चुनावों की भव्यता समाप्त हो जाएगी. कैश क्रंच से टिकटों की बिकवाली प्रभावित होगी व योग्य उम्मीदवार नहीं मिल सकेंगे. पैसे के अभाव में माननीय गण शेयर्ड OLA में चुनाव प्रचार करेंगे. दो विरोधी नेता OLA शेयर करते हुए और क्या क्या शेयर करेंगे, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है. चुनाव प्रचार का भोंपू ठेले पर होगा. मंच के नाम पर चटाई लगेगी. दलों के गुंडे बम व गोली की जगह चुटपुटिया फोड़ेंगे. पोस्टर व झंडे न के बराबर होंगे. समर्थक व कार्यकर्ता मटन चिकन की जगह चना चबेना खाएंगे. मतदाताओं को दारु व मोटे कैश की जगह बिन्दी और पेंसिल जैसे उपहार मिलेंगे. चुनाव जीतने वाला हद से हद सवा किलो बताशे बाँटेगा. लिहाजा कार्यकर्ता व मतदाता चुनावों के प्रति उदासीन हो जाएंगे और लोकतंत्र कमजोर होगा. चुनावों की भव्यता समाप्त होने पर देश की जो जगहँसाई होगी, सो अलग.”

लेखक द्वय भी इस जोरदार तर्क को प्रोक्योर करने से स्वयं को रोक न सके.

लेखक द्वय – आशुतोष दीक्षित (@Cawnporiah) एवं राकेश रंजन (@rranjan501)
रेखाचित्र – सुरेश रंकावत (@Sureaish)

2 COMMENTS

  1. बार बार पढ़कर हास्य-व्यंग्य की गंगा में डुबकी लगाने जैसा फील इस मुफलिसी के समय हो रहा है.

  2. लेखक द्वय को शब्द चयन हेतु साधुवाद।
    एक भारत निर्माण कथा अधूरी रह गई थी शायद,क्या हुआ उसका?

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